भोर की प्रतीक्षा में ...

कविताएँ एवं लेख

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Nirmala Singh Gaur


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सावन—निर्मला सिंह गौर

Posted On: 19 Jul, 2016  
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सफ़र—-निर्मला सिंह गौर

Posted On: 17 May, 2016  
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रास्ता….निर्मला सिंह गौर

Posted On: 30 Jan, 2016  
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दोस्ती—निर्मला सिंह गौर

Posted On: 9 Oct, 2015  
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बेटियां — निर्मला सिंह गौर

Posted On: 8 Sep, 2015  
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साया — निर्मलासिंह गौर

Posted On: 26 Aug, 2015  
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भावना के स्वच्छ निर्झर —निर्मला सिंह गौर

Posted On: 11 Aug, 2015  
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संतुलन —निर्मला सिंह गौर (विश्व पर्यावरण दिवस पर )

Posted On: 5 Jun, 2015  
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माँ मेरी …निर्मला सिंह गौर

Posted On: 9 May, 2015  
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सफ़र—निर्मला सिंह गौर

Posted On: 1 Apr, 2015  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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के द्वारा: Nirmala Singh Gaur Nirmala Singh Gaur

बरसों पहले 'अणुशक्ति' पत्रिका में पहली बार पढ़ी थी आपकी यह कविता । इतना प्रभावित किया इसने मुझे कि इसकी कई पंक्तियाँ तो मुझे कंठस्थ हो गई हैं और मैं गाहे-बगाहे उन्हें उद्धृत भी करता हूँ । सच ही तो है - दोस्त है जो अनकहे ही दर्द को पहचान ले, हाल-ए-दिल क्या है ये बस चेहरे से पढ़ कर जान ले । दोस्त आपको समझते हैं, समझाते नहीं । इसीलिए वे दुर्लभ होते हैं । समझाने वालों की क्या कमी है दुनिया में ? एक ढूंढिए, हज़ार मिलते हैं । वो हमारे दर्द को समझेंगे क्या, जानेंगे क्या जो हमें जब भी मिलें, हम को ही समझाने लगें । सच्ची दोस्ती क्या है, अगर कोई जानना चाहे तो बस आपकी इस कविता को पढ़ ले, गुन ले, मन में उतार ले । आपकी यह कविता मात्र प्रशंसनीय नहीं है, अनमोल है यह ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

आदरणीया निर्मला सिंह गौर जी ! सुप्रभात ! नई सुबह सबके लिए मंगलमय हो ! 'बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक' चुने जाने पर मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिये ! ये रचना पूर्णतः इस सम्मान की हकदार थी ! इस सम्मानित मच के संपादक मंडल को धन्यवाद ! जागरण मंच के संपादक मंडल से एक अनुरोध है कि मंच के मुख्य पृष्ठ पर पोस्ट डिस्प्ले बोर्ड में लगभग २४ घंटे 'काला जादू' और 'वशीकरण' की फर्जी पोस्ट दिखाई देती हैं ! यदि ये फर्जी पोस्ट हैं तो इनका रजिस्ट्रेशन रद्द कीजिये ! यदि ये रुपए लेकर प्रकाशित होने विज्ञापन हैं तो दुनिया के सबसे अमीर और सम्मानित अखबार 'दैनिक जागरण' के इस मंच के बारे में क्या कहूँ ! बहुत दुःख के साथ बस इतना ही- रूपये कमाने की खातिर अपने आदर्श, नैतिकता और जमीर सब बेच दिए ! इस विषय पर अब तो कुछ सकारात्मक और मंच के हित में चिंतन कीजिये ! सादर धन्यवाद !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा: Nirmala Singh Gaur Nirmala Singh Gaur

के द्वारा: Nirmala Singh Gaur Nirmala Singh Gaur

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

के द्वारा: deepak pande deepak pande

पूर्णतः सत्य हैं आपके द्वारा प्रकट किए गए ये विचार । अपने बच्चों पर पढ़ाई का गुरुतर भार देखकर मेरा हृदय उनके साथ ही रुदन कर उठता है । क्या लाभ है ऐसे जीवन का जिसमें जीवन के लक्षण ही दिखाई न दें, बच्चों के साथ उनका बचपन न रहे, मनुष्य का मनुष्यत्व ही खो जाए ? संभवतः आज के भौतिकतावादी युग ने अनचाहे ही हमें इस दौड़ में धकेल दिया है जिससे हम बाहर नहीं आ पाते क्योंकि जैसा परिवेश मिला है, उसी के अनुरूप ढलकर जीना एक विवशता है । मेरे जैसे संवेदनशील लोगों के लिए तो यह जीवन चिपटने वाला कंबल बन गया है । व्यक्ति कंबल को छोडना चाहता है लेकिन कंबल ही उसे नहीं छोडता । अत्यंत पीड़ादायक है यह लाचारी । आपके शब्द मुझे अपनी ही भावनाओं का प्रतिबिंब लगते हैं । बहुत-बहुत साधुवाद इस रचना के लिए ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

अत्यंत सुंदर एवं भावपूर्ण कविता है यह आपकी । मित्र हो तो बस ऐसा ही हो । और हम मित्र बनें किसी के तो बस ऐसे ही बनें । पर ऐसे सच्चे मित्र इस स्वार्थी संसार में बड़े दुर्लभ हैं निर्मला जी । आप की एक अन्य कविता की पंक्ति है - 'इस ज़माने में बड़ी मुश्किल से मिलते हैं यहाँ' । आप ही ने कहा है - 'दोस्त वो है बिन कहे जो दर्द को पहचान ले, हाल-ए-दिल क्या है, ये बस चेहरे से पढ़कर जान ले' । समझाने वालों से दुनिया भरी पड़ी है लेकिन ऐसा मित्र जो आपको समझाने का नहीं बल्कि समझने का प्रयास करे, सिर्फ़ किस्मत से मिलता है:अत्यंत सुंदर एवं भावपूर्ण कविता है यह आपकी । मित्र हो तो बस ऐसा ही हो । और हम मित्र बनें किसी के तो बस ऐसे ही बनें । पर ऐसे सच्चे मित्र इस स्वार्थी संसार में बड़े दुर्लभ हैं निर्मला जी !

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

के द्वारा:

आदरणीया निर्मला सिंह गौर जी ! सादर अभिनन्दन ! दिन हुआ सरपट हिरन रातें नशीली हो गयीं, माँ के चहरे की लकीरें और गहरी हो गयीं ! उम्र छोटी पड़ गयी और रास्ते लम्बे हुए, राह में कुछ यात्रियों की म्याद पूरी हो गयी ! बहुत सुन्दर पंक्तियाँ ! जी..चौकिएगा मत ! सृजनमंच पर आपकी कवितायेँ पढ़ीं ! बहुत अच्छी लगीं ! सरल भाषा में शिक्षाप्रद और बहुत उपयोगी आपकी लेखनी को सलाम ! प्रस्तुत रचना की ये पंक्तियाँ बहुत विशेष हैं-तुम मुझे स्वीकार करो उन अक्षमताओं के साथ, जो ईश्वर ने मुझे दीं हैं मगर उनके होने का अहसास नहीं दिया ! आपकी रचनाएँ इस मंच रूपी गुलदस्ते में बहुत सुन्दर पुष्प के सदृश सजी हुई हैं ! ऐसी विचारणीय और उपयोगी रचनाओं की प्रस्तुति के लिए हार्दिक आभार !

के द्वारा:

के द्वारा: DR. SHIKHA KAUSHIK DR. SHIKHA KAUSHIK

आदरणीय निर्मला सिंह गौर जी ! आपकी नई रचना पढ़ी ! हमेशा की भांति आपने बहुत अच्छा लिखा है ! सुख-सुविधा प्राप्त करने के लिए प्रकृति और ईश्वर का अधिकतम दोहन कैसे हो,मनुष्य ने सदा से ही ये प्रयास किया है ! प्रकृति तो जड़ है,परन्तु है वो पुरुष में ही समाहित ! पत्थर की मूर्तियां भी ईश्वर के ही भीतर हैं ! यही वजह है कि भक्तों की भक्ति के समक्ष नतमस्तक होकर पत्थर की मूर्तियों को भी बोलना पड़ा ! आपकी ये बात व्यवहारिक धरातल पर काफी हद तक सही है कि "आसक्ति दिखा कर इष्टदेव की शक्ति परीक्षा करते हो, फिर ईश्वर को पत्थर कह कर,मन से निष्कासित करते हो, है प्रेम का मतलब त्याग,मगर तुम तो सौदा कर जाते हो, अवसादों के काराग्रह में निर्दोष कैद हो जाते हो ||"आम आदमी को ये बात समझाने की जरुरत है कि देवी-देवताओं की मूर्तियां तो उनके प्राकट्य का एक माध्यम भर हैं,मूल चीज है निष्काम भक्ति ! आपके स्वास्थ्यलाभ की शुभकामना के साथ सादर अभिनन्दन और बहुत बहुत बधाई !

के द्वारा:

के द्वारा: राजीव उपाध्याय राजीव उपाध्याय

के द्वारा: amitmit1983 amitmit1983

प्रकृति का इतना सूक्ष्म चित्रण, निश्चित रूप से आप "आदरणीय" हैं और जो लोग कुछ भी लिखना चाहते उन लोगों के लिए उपयोगी होगा की वो लोग "आपकी रचनाएं पढ़ें " . ===================================== देखते ही देखते सब पेड़ गंजे हो गये धूप के भी गर्म तेबर के शिकंजे हो गये हो गयी छाया नदारद ,लू से मुरझाया चमन तेज़ सूरज पी गया जल ,ताप से झुलसा बदन | ............................................................... रंग,खुशबू और सुन्दरता का फिर जमघट लगा सज़ गया सारा चमन,दुर्दिन का गम भी छंट गया आसमां को रूप दिखलाने बहारें आ गयीं दर्द का अहसास झुठलाने बहारें आ गयीं || ==================================== पीड़ा और संघर्ष का इतना सहज वर्णन पता नहीं और कर भी पाये हैं या नहीं, पर आपनें तो कर ही दिया है .

के द्वारा: Pankaj Kumar Mishra Vatsyayan Pankaj Kumar Mishra Vatsyayan

के द्वारा: DR. SHIKHA KAUSHIK DR. SHIKHA KAUSHIK

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

के द्वारा: Nirmala Singh Gaur Nirmala Singh Gaur

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के द्वारा: DR. SHIKHA KAUSHIK DR. SHIKHA KAUSHIK

के द्वारा: pkdubey pkdubey

के द्वारा: Nirmala Singh Gaur Nirmala Singh Gaur

के द्वारा: Nirmala Singh Gaur Nirmala Singh Gaur

के द्वारा: kavita1980 kavita1980

आदरणीय निर्मला सिंह गौर जी,सुप्रभात ! आपकी ये रचना मैंने पढ़ना शुरू किया तो अच्छी लगी और आखिर तक पढ़ते पढ़ते बहुत अच्छी लगी.कितनी सहजता से आपने पुराणी यादें ताजा की हैं-होली के चार दिन पहले से कनस्तर भर भर कर गुझिया,पपड़ी,लड्डू एवं मठरी खुरमे बनना शुरू हो जाते थे| माँ, चाची, बुआजी, दीदियाँ, भाभिया और हमारी महाराजिन काकी (खाना बनाने वाली) सब घर का काम निबटा कर होली के गीत गुनगुनाते हुए पकवान बनाने बैठ जातीं थी,बीच बीच में उनकी हंसी ठिठोली भी चलती रहती थी, तब टी.वी,कम्प्यूटर तो था नही, मनोरंजन के यही तरीके होते थे ,रसोई घर काफी बड़ा था उसमे ही माँ की कोई पुरानी धुली सिथेतिक साडी बिछा कर ,उस पर गुझिया पपड़ी बना बना कर रखी जातीं थी,जिनको बाद में तल कर डिब्बों में भर कर रखते थे, उस समय घर में ही चूल्हे पर ही दूध का मावा बनाया जाता था,जिसके भूनने की सुगंध वातावरण को महका देती थी.कितना अच्छा सन्देश आपने सन्देश दिया है-फागुन के महिने में टेसू के पेड़ केसरिया रंग के फूलों से लद जाते हैं तो होली जलने वाले दिन हमारे घर के माली और नौकर जंगल जा कर ढेर सारे टेसू के फूल तोड़ कर लाते थे, फिर उनको साफ करके एक लोहे के चार बाई चार फुट के और दो हांथ गहरे टब में डाल देते थे,पानी में रंग पूरा उतर जाये तो पहले टब को चारों कोनो से उठा कर उसके नीचे ईंटें रख देते थे फिर पानी और टेसू के फूल भर कर आग जला कर गर्म कर देते थे चूँकि मध्य प्रदेश में तब होली तक थोड़ी ठण्ड पड़ती थी तो सुबह हल्का गुनगुना रंग बच्चों की सेहत के लिए मुफ़ीद रहता था, रंग का सौन्दर्य देखने लायक होता था, पानी में डूबते सूरज की लालिमा लिए, खुशबूदार गहरा केसरिया रंग तैयार हो जाता था, माँ बतातीं थी की इस रंग से होली खेलने से कभी भी चर्म रोग और फोड़े फुंसी नहीं होते,ये उस समय का अनुभूत चिकित्सा विज्ञान था.बहुत सार्थक उपयोगी और शिक्षाप्रद रचना.मेरी तरफ से आपको बहुत बधाई और कांटेस्ट हेतु शुभकामनाएं.

के द्वारा:

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

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के द्वारा: Ritu Gupta Ritu Gupta

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के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

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