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'पागल' ---निर्मला सिंह गौर की कविता

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जब कहा था आपने ‘पागल’ मुझे
मै समझ के शीर्ष पर आसन्न था
आपकी ही धारणा त्रुटि पूर्ण थी
मै तो अपने उच्चध्यानामग्न था |
जब बने सर्वोच्य तुम इस ठौर पर

पा तरक्क़ी रिश्वतों के ज़ोर पर
मै अडा बैठा रहा सिद्दांत पर

तब  कहा  था आपने ‘असफ़ल’ मुझे
मै स्वायत्ता पर ही अपने धन्य था
आपकी ही नीतियां पथ भ्रष्ट थीं
मै तो अपने उच्च ध्यानामग्न था |
जब विलसित वस्तुओं की होड़ में
या दिखावे की अलक्षित दौड़ में
मै रहा स्थिर,अनुत्साहित,अभय
तब कहा था आपने ‘घायल’ मुझे
मै कहीं पहले से सेहत मंद था
आपकी ही धड़कने बैचैन थीं
मै तो अपने उच्च ध्यानामग्न था |
जब विवशता वश न देना दान का
बन गया कारण मेरे अपमान का
दम्भ से फिर देखकर मेरी तरफ़
कह दिया था आपने ‘निर्धन’ मुझे
मै धरम ईमान से सम्पन्न था
आपकी ही चेतना अवरुद्ध थी
मै तो अपने उच्चध्यानामग्न था |
जब कहा था आपने ‘पागल’ मुझे
मै समझ के शीर्ष पर आसन्न था |

आपकी ही धारणा त्रुटि पूर्ण थी

मै तो अपने उच्च ध्याना मग्न था |

Review Summary :

Reviewer : Nitin Chauhan
Review Date : 2013-11-20 15:54:10
Item Name : Awesome Hindi Story written by Nirmala Singh Gaur!
Author Rating: 5


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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

seemakanwal के द्वारा
November 20, 2013

सुन्दर रचना .आभार

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 22, 2013

सुन्दर रचना .सादर, बधाई

Pankaj Kumar Mishra Vatsyayan के द्वारा
February 14, 2014

निर्मला जी गज़ब के शब्दों का प्रयोग कर रही हैं आप, वास्तव में ऐसे यौगिक शब्दों का प्रयोग कहाँ कौन कर पता है। चिंतन का यह स्तर, काबिले तारीफ़ है। सिर्फ इतना ही इस कविता के लिए पर्याप्त होगा …………” मीरा शयाम में मगन थी और दुनिया उन्हें पागल समझ रही थी “

ranjanagupta के द्वारा
February 14, 2014

सुन्दर रचना !उच्च कोटि की भाव व्यंजना !निर्मला जी !बहुत बधाई !!

Cassie के द्वारा
October 17, 2016

If you wrote an article about life we’d all reach engheitlnment.


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