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मोह ---निर्मला सिंह गौर की कविता

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मोह की दीवार पर आसन्न हम
कंकडों की चुभन को सहते रहे
थे अधर मुस्कान से परिचित मगर
अश्रु भी नयनो तले बसते रहे |
.
हम सदा कर्तव्य पालन में रहे
वार खाकर भी डटे रण में रहे
दर्द की करते रहे अवहेलना
घाव रह रह कर मगर रिसते रहे
अश्रु भी नयनो तले बसते रहे |
.
हम नहीं अनभिज्ञ थे संघर्ष से
कुटिलताओं से रचे आदर्श से
आगमन उत्सव है तो प्रस्थान भी
किन्तु स्मृति सर्प तो डसते रहे
अश्रु भी नयनो तले बसते रहे |
.
स्वजन हित की खोज में आसक्त हम
किस महात्मा के हुए अभिषप्त हम
जिस घड़ी ठोकर से हम मूर्छित हुये
करके अवलोकन स्वजन हँसते रहे
अश्रु भी नयनो तले बसते रहे |

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

seemakanwal के द्वारा
November 24, 2013

अति सुन्दर रचना .आभार

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 27, 2013

सार्थक सशक्त.रचना

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
November 27, 2013

सुन्दर भावपूर्ण काव्यात्मक प्रस्तुति ! बधाई !!

Mann Ki Kawita के द्वारा
November 27, 2013

अश्रु भी नयनो तले बसते रहे |……………………….बहुत खूबसूरत रचना आपकी

abhishek shukla के द्वारा
November 27, 2013

bahut खूबसूरती ke sath shabdon me piroya hai aapne ….abhaar

rajanidurgesh के द्वारा
November 27, 2013

नमस्कार निर्मलाजी आपकी कविता मन को मोह लिया बधाई

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 27, 2013

मेरी लेखनी को आप सब साहित्य मनीषियों  के प्रोत्साहन की बहुत ज़रूरत है, आपकी प्रतिक्रिया की मै प्रतीक्षा करती हूँ . आप सब के अमूल्य कॉमेंट्स के लिए ह्रदय से आभारी हूँ . सादर , निर्मला सिंह गौर

deepakbijnory के द्वारा
November 28, 2013

स्वजन हित की खोज में आसक्त हम किस महात्मा के हुए अभिषप्त हम जिस घड़ी ठोकर से हम मूर्छित हुये करके अवलोकन स्वजन हँसते रहे अश्रु भी नयनो तले बसते रहे | वाह सुंदर रचना आदरणीय निर्मला जी

Bhagwan Babu 'Shajar' के द्वारा
November 28, 2013

बहुत खूब….

Mina के द्वारा
October 17, 2016

Weeeee, what a quick and easy souonilt.


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