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ओ!पतझड़ के अंतिम त्रण --निर्मलासिंहगौर की कविता (साहित्य सरताज प्रतियोगिता )

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ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण,  तुमने देखा है युग दर्पण

तुमने देखी है ज्योतिस्ना,  तुमने देखा है चंद्रग्रहण

…ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण|

तुमने देखे हैं जन्मोत्सव , तुमने देखे हैं दाह कर्म

तुमने देखी है लूटमार,  तुमने देखे  हैं  दान धर्म

तुमने देखी है बाढ़ कहीं,  तुमने देखा सूखा अकाल

तुमने देखा है अनुद्धत , तुमने ही देखा है धमाल

कैसे होता है नियम भंग, कैसे होता है अनुशासन

ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण |

कैसे निर्धन का धन लेकर, इठलाते हैं उद्योगपति

कैसे निर्बल शोषित होते,  कैसे फलती है राजनीति

तुमने देखा है समझौता,  तुमने देखा है आन्दोलन

धनवान सभी हैं लाभान्वित, निर्धन होते जाते निर्धन

कैसे मरता आयुष्यमान, कैसे जीता है मरणासन्न

ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण |

तुमने देखे संगी साथी धरती पर एक एक झरते

सन्नाटे में दस्तक देते ,निर्जीव,  हवाओं में उड़ते

जन्मस्थल से अवसानो  की यात्राओं का मंजर देखा

बालपन से ब्रद्धावस्ता तक तन होते जर्ज़र देखा

तुमने देखी है तरुणाई , तुमने ही देखा है बचपन

ओ ! पतझड़ के अंतिम त्रण |

देखो तो अब कुछ रंग बदले  नव अंकुर आये हैं बाहर

कुछ हवा चली है पश्चिम की , नव कोंपल  पर है चढ़ा असर

क्या पता ये अंकुर अब तरु को किस ओर हांक ले जायेंगे

तुम तो एक दिन झर जाओगे , फल कैसे कैसे आयेंगे

पहचान न अपनी खो बैठे , भगवान् बचाए ये मधुवन

ओ! पतझड़ के अंतिम त्रण |

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ranjanagupta के द्वारा
January 17, 2014

निर्मला जी!बहुत उत्तम रचना !बहुत बधाई !शब्दों का चयन सुन्दर !भाव बेहद सामयिक !और मार्मिक !!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
January 19, 2014

बहुत आभार रंजना जी ,आप जैसे स्तरीय लेखकों  के प्रसंशनीय शब्द मेरे लिए प्रेरणा श्रोत हैं . सादर , निर्मला सिंह गौर

yamunapathak के द्वारा
January 30, 2014

आपकी इस कविता में पतझड़ का प्रतीकात्मक प्रयोग बहुत सुन्दर है. साभार

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
January 30, 2014

कोई कविता का इशारा समझ ले तो लिखने वाले की आत्मा तृप्त हो जाती है ,बहुत आभार यमुना जी आपका . धन्यबाद , निर्मल

Kamryn के द्वारा
October 17, 2016

My hat is off to your astute command over this topi-cbravo!


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