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एक टुकड़ा बादलों का ---निर्मला सिंह गौर की ग़ज़ल (कांटेस्ट )

Posted On: 28 Jan, 2014 Others में

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एक टुकड़ा बादलों का आ गया छत पर मेरी
और उसके बाद तो बस नम ही नम मौसम रहा ,
जब चिरागों के तले देखा अँधेरा झांक कर
फिर रही कोई ख़ुशी बाक़ी न कोई ग़म रहा |
=
ग़म किसी के भी हों, लगता है कि जैसे हो मेरे
दिल बहुत दिन तक नहीं रखता कभी शिकबे-गिले
और खुशियाँ जब भी आई हैं मेरी मेहमान बन
उनकी दस्तक से खुले हैं द्वार मुश्किल से मेरे |
=
सच तो ये है मेरे दुनिया अलग हैं रास्ते
पर हथेली पर रखी है जान सबके वास्ते
जब मुझे दिखने लगीं दो सूरतें इन्सान की
फिर रहा कोई दोस्त मेरा ,ना कोई दुश्मन रहा |
=
जब चिरागों के तले देखा अँधेरा झांक कर
फिर रही कोई ख़ुशी बाक़ी ,न कोई ग़म रहा |
=
चाह है अब राह में मेरी नहीं कलियाँ बिछें
और मुझको फर्शे मखमल की हकीक़त न ठगे
पांव के छाले मुझे होंगे बहुत प्यारे अगर
बाद मेरे जो भी गुज़रे, उसको न काँटा चुभे |
=
इस जहाँ की आंकने का सबका अपना ढंग है
या तो हैं कुछ लोग बौने या नज़र ही तंग है
ज़िन्दगी में खूब पाया और खोया भी बहुत
पर किया ना कोई जलसा, ना कभी मातम रहा |
=
जब चिरागों के तले देखा अँधेरा झांक कर
फिर रही कोई ख़ुशी बाक़ी, न कोई ग़म रहा ||

निर्मला सिंह गौर



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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
January 28, 2014

आपकी प्रथम रचना पढी सुन्दर प्रस्तुति

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
January 28, 2014

अभिनन्दन निशा जी ,और भी पढ़िये आपकी निष्पक्ष प्रतिक्रिया का स्वागत है . सादर , निर्मल

ranjanagupta के द्वारा
January 28, 2014

निर्मला जी बहुत अच्छा लिखा !दीपक के नीचे का अंधकार ही ,ऊपर प्रकाश बन ज्योति बिखेरता है !दुःख ही के कारण सुख का अस्तित्व है बधाई !!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
January 28, 2014

आपके विचारों की अनुग्रहीत हूँ ,रंजना जी और सच में जागरण जंक्शन की भी कि उसके माध्यम से मै आप और विजय गुंजन जी जैसे साहित्य मनीषियों की रचनाओं का लुत्फ़ उठा रही हूँ ,हार्दिक शुभ कामनाएं ,लिखतीं रहें . सादर आभार , निर्मल

सौरभ मिश्र के द्वारा
January 30, 2014

इतना सकारात्मक कोई नही सोचता जितना आपने कविता मे उकेरा,पर खूबसूरत कल्पना कहूगा मै इसे

sanjay kumar garg के द्वारा
January 30, 2014

“पांव के छाले मुझे होंगे बहुत प्यारे अगर बाद मेरे जो भी गुज़रे, उसको न काँटा चुभे |” सुन्दर अभिव्यक्ति आदरणीया निर्मला जी, बधाई!

yamunapathak के द्वारा
January 30, 2014

चाह है अब राह में मेरी नहीं कलियाँ बिछें और मुझको फर्शे मखमल की हकीक़त न ठगे पांव के छाले मुझे होंगे बहुत प्यारे अगर बाद मेरे जो भी गुज़रे, उसको न काँटा चुभे निर्मला जी सबसे अच्छी और दिल के करीब लगी है ग़ज़ल के ये शेर.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
January 30, 2014

सौरभ जी ,आभार ,आपने मेरी ग़ज़ल के सकारात्मक पहलू को सम्मान दिया. सादर शुभ कामनाएं निर्मल

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
January 30, 2014

आदरनीय संजय गर्ग जी , आपने ग़ज़ल का मर्म समझ कर कुछ शब्द सराहना के लिख दिए ,ये मेरे लिए बड़ा अवार्ड है . बहुत आभार , निर्मल

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
January 30, 2014

आदरनीय यमुना जी ,आज मै बहुत खुश हूँ कि आपने मेरी रचनाये पढ़ी हैं ,आप स्वम् बहुत अच्छा लिखतीं है , सादर आभार , निर्मल

डा श्याम गुप्त के द्वारा
February 11, 2014

निर्मला जी अच्छी रचना है ..पर यह नज़्म है ग़ज़ल नहीं…..

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 11, 2014

आदरनीय डॉ.श्याम गुप्त जी ,मेरी नज़्म की सराहना के लिए आभार ,इस मंच पर अभी मुझे बहुत कुछ सीखना बाक़ी है , शुभ कामनाएं , निर्मल

punita singhs के द्वारा
February 14, 2014

निर्मला जी आपकी रचनाएं पहली वार पढ़ी बहुत खूब शब्दों पर आपकी पकड़ का ज़वाब नहीं मुझे पसंद आई आपकी कवितायें | पुरूस्कार के लिए ढेरों बधाइयां स्वीकारें | आशा है आगे भी इस माध्यम से मुलाक़ात होती रहेगी क्योंकि मई भी इसी राह की मुसाफिर हूँ शुभकामनाएं |

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 14, 2014

नमस्ते पुनीता जी ,मेरी रचना आपको पसंद आई और आप ने ये बात मुझ तक पहुंचाई ,बहुत आभार, आपका इस मंच पर स्वागत है . सादर , निर्मल

deepak pande के द्वारा
March 18, 2014

इस जहाँ की आंकने का सबका अपना ढंग है या तो हैं कुछ लोग बौने या नज़र ही तंग है ग़म किसी के भी हों, लगता है कि जैसे हो मेरे दिल बहुत दिन तक नहीं रखता कभी शिकबे-गिले और खुशियाँ जब भी आई हैं मेरी मेहमान बन उनकी दस्तक से खुले हैं द्वार मुश्किल से मेरे | वाह निर्मला जी हर पंक्ति में एक अलग जिंदगी का दर्शन है बार बार पड़कर भी मन नहीं भरता कविता में डूब जाने का मन करता है

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 18, 2014

आपके सराहना शब्द काव्य रचना के लिए संजीवनी हैं दीपक जी ,ब्लॉग पर आ कर कविता पढ़ने के लिए सादर आभार .

pkdubey के द्वारा
May 8, 2014

VERY DEEP MEANING IN EVERY LINE MADAM.SADAR AABHAR.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 9, 2014

जिस धरातल पर खडे हो कर कविता लिखी हो पढ़ने वाला भी उसी धरातल पर खड़े होकर समझ ले ,ये लेखक के लिए बड़ा अवार्ड होता है , धन्यवाद ,आपको अनेक शुभकामनायें ,चि.पी.के.दुबेजी.


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