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मत सहेजो ---निर्मला सिंह गौर

Posted On: 30 Jan, 2014 Others,Hindi Sahitya में

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मत सहेजो मोतियों को सींपियों से छीन कर
आंख में छलके हुये आंसू की क़ीमत  जान  लो
हो गया है मुक्त मन संवेदना के पाश से
तो इसे जाकर किसी संतृप्त मन से बांध लो |
=
मत समेटो खुशबुओं को ये महज़ अहसास हैं
पुष्प के तन में बसी ये तितलियों की आस है|
=
है भ्रमर को हक़ कि वो फूलों का आलिंगन करे
नृत्य और संगीत से सौन्दर्य सम्मोहन  करे |
=
हैं ये आभूषण विधाता ने दिए उपहार में
देव पर चढ़ते हैं  गुंथ कर या  पिरो कर हार में |
=
गोद में शूलों की हैं पर रंज़ो -ग़म से दूर हैं
खुश नुमा सूरत है और मुस्कान से भरपूर हैं |
=
ये खिले रहते हैं अपने अल्प जीवन काल में
सीख देते हैं हमें रहने की खुश हर हाल में |
=
मत करो ब्यापार इनका ये महज़ सौगात हैं
सिर्फ अवलोकन करो सौन्दर्य ही पर्याप्त है |
=
मत तलाशो खुशियों को बाज़ार की दूकान में
अधर पर खिलती हुई मुस्कान को पहचान लो |
=
मत सह्जो मोतिओं को सीपियों से छीन कर
आँख में छलके हुये आंसू की कीमत जान लो ||
=
निर्मला सिंह गौर



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17 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

January 31, 2014

मत सहेजो मोतियों को सींपियों से छीन कर आंख में छलके हुये आंसू की क़ीमत जान लो हो गया है मुक्त मन संवेदना के पाश से तो इसे जाकर किसी संतृप्त मन से बांध लो | बहुत सुन्दर मन को भा गयी पंक्तियाँ .

jlsingh के द्वारा
January 31, 2014

मत सह्जो मोतिओं को सीपियों से छीन कर आँख में छलके हुये आंसू की कीमत जान लो || बहुत ही हृदयग्राही रचना, आदरणीया

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
January 31, 2014

आभार शालिनी जी ,आपके विचार अमूल्य हैं . सादर , निर्मल

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
January 31, 2014

नमस्कार जवाहर जी ,आपने मेरी कविता को सराहा ,अनुग्रहीत हूँ . सादर आभार , निर्मल

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
January 31, 2014

” हो गया है मुक्त मन संवेदना के पाश से तो इसे जाकर किसी संतृप्त मन से बाँध लो ! अभिव्यति की अनूठी शैली और उक्ति वैचित्र्य भी !निर्मला जी ! विशेष बधाई ! शेष फिर !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 1, 2014

अतिशय आभार विजय जी ,आप जैसे साहित्यकार जिस कविता पर नज़र डालें ,और सराहना कर दें ,ये लेखक के लिए सुखद अनुभूति है ,बहुत धन्यवाद . सादर ,निर्मल

ranjanagupta के द्वारा
February 1, 2014

बहुत सुन्दर !बहुत मनोहर !निर्मल जी !बहुत बहुत सद्भावनाएँ !! और बधाई !!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 1, 2014

आपको कविता पसंद आई ,यहीं उसका स्तर तय हो गया ,रंजना जी ,आपकी प्रतिक्रिया प्रतीक्षित रहती है . सादर आभार निर्मल

Rajesh Kumar Srivastav के द्वारा
February 1, 2014

मत तलाशो खुशियों को बाज़ार की दूकान में अधर पर खिलती हुई मुस्कान को पहचान लो | बहुत खूब / बहुत खूब / खूबसूरत और सशक्त शब्दों का प्रयोग / मन को भा गया आपकी रचना /

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 1, 2014

बहुत आभार आदरनीय राजेश श्रीवास्तव जी ,आपके विचार भी मेरी कविता के समतुल्य हैं कि खुशियाँ बाज़ार से नहीं खरीदी जा सकतीं .आपकी प्रतिक्रिया अच्छी लगी . सादर , निर्मल

deepakbijnory के द्वारा
February 2, 2014

WAH BAHOOT KHOOB

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 2, 2014

आपकी सराहना मेरे लिए प्रेरणा है . सादर आभार ,दीपकजी निर्मल

ranjanagupta के द्वारा
February 13, 2014

निर्मला जी!बहुत बहुत बधाई !मंच पर नवोदित रचनाकारों में सम्मान और विजय श्री प्राप्त करने के लिए !इसी से आपकी प्रतिभा का आकलन किया जा सकता है !पुनश्च !!

yamunapathak के द्वारा
February 21, 2014

वाह !!!!!!!!!!!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 21, 2014

नमस्ते यमुना जी ,आपका ,वाह !!!!!!,बहुत उत्साह वर्धक है ,धन्यवाद सादर , निर्मल

pkdubey के द्वारा
May 8, 2014

मेरा मानना है -साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं ,ये भूखे मस्तिष्क का अच्छा भोजन भी है.माननीया आप बहुत अच्छा भोजन परोसती हैं -भूखे मश्तिष्कों को.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 9, 2014

आपने सही कहा चि.पी .के.दुबे जी ,साहित्य किसी भी देश की संस्कृतिक प्रष्टभूमि की स्तरीयता को प्रकट करता है ,बहुत ख़ुशी हुई यह जान कर की मेरी रचनाएँ इस योग्य हैं कि साहित्य पिपासा को तृप्त कर सकें ,आपका हार्दिक आभार .


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