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कभी तुम मिले तो ...निर्मला सिंह गौर

Posted On: 14 Feb, 2014 Others,Hindi Sahitya,(1) में

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कभी फ़र्ज़ ने समझाई मुझे मेरी सरहदें
कभी तुमने ज़िदगी के मतलब बदल दिये ,
कभी वक़्त ने बुझाये उम्मीद के चिराग़
कभी तुम मिले तो राह में जुगनू से जल गये |
.
कभी प्यार मिला इतना पल-छिन संवर गये
कभी नफ़रतों के झंडे सरेराह गड गए
कभी फूल गले मिल  कर नश्तर चुभो गए
कभी ख़ार मिले ऐसे कुछ ज़ख़्म सिल गए ,
कभी तुम मिले तो राह में जुगनू से जल गए |
.
कभी जमघटों में रह कर तन्हाई भा गयी
कभी तन्हा ज़िन्दगी की दहशत सता गयी
कभी बीच समुन्दर में किश्ती रही महफ़ूज़
कभी साहिलों पे आकर तूफ़ान मिल गए
कभी तुम मिले तो राह में जुगनू से जल गये||
.
निर्मल



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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjay kumar garg के द्वारा
February 14, 2014

“कभी तुम मिले तो राह में जुगनू से जल गये |” आदरणीया निर्मला जी, सुन्दर कविता के लिए आभार!

कभी तुम मिले तो राह में जुगनू से जल गये..सुंदर रचना ..”कभी फूल गले मिल कर नश्तर चुभो गए कभी ख़ार मिले ऐसे कुछ ज़ख़्म सिल गए ,”….कभी बीच समुन्दर में किश्ती रही महफ़ूज़ कभी साहिलों पे आकर तूफ़ान मिल गए पंक्तियाँ विशेष रूप से पसंद आई…पंक्तियाँ विशेष रूप से पसंद आई..सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई..सादर..

deepakbijnory के द्वारा
February 14, 2014

कभी फूल गले मिल कर नश्तर चुभो गए कभी ख़ार मिले ऐसे कुछ ज़ख़्म सिल गए वह कमाल का विरोधाभास सदर नमन

ranjanagupta के द्वारा
February 14, 2014

निर्मला जी !बहुत बहुत बधाई !उत्कृष्ट भावाभिव्यक्ति !!लयमान !!

Raj Ranna के द्वारा
February 14, 2014

Maaaaaaa…………….

jlsingh के द्वारा
February 15, 2014

कभी फूल गले मिल कर नश्तर चुभो गए कभी ख़ार मिले ऐसे कुछ ज़ख़्म सिल गए , कभी तुम मिले तो राह में जुगनू से जल गए | वाह क्या पंक्तियाँ रची है आपने! बेहद खूबसूरत!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 15, 2014

आदरणीय रंजना जी ,दीपकजी ,संजय जी एवं शिल्पा जी ,रचना पसंद करने के बाद मुझ तक अपनी बात पहुँचाने का श्रम करने के लिए मै आप सब की ह्रदय से आभारी हूँ ,कल हाथ में फ्रेक्चर हो गया ,प्लास्टर चढ़ गया तो टाइप करने में तकलीफ है ,इसलिए सम्मलित धन्यवाद दे रही हूँ ,पर इस बीच और कोई काम नहीं ,आप सब की रचनाएँ पढने का लुत्फ़ उठाउंगी . सादर निर्मल

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 15, 2014

सराहना के लिए ह्रदय से आभारी हूँ जवाहर सिंह जी . सादर , निर्मल

vaidya surenderpal के द्वारा
February 19, 2014

कभी ख़ार मिले ऐसे कुछ ज़ख़्म सिल गए , कभी तुम मिले तो राह में जुगनू से जल गए | भावनाओं का बहुत सुन्दर यथार्थ चित्रण…

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
February 19, 2014

कभी-कभी व्यष्टि समष्टि बन जाती है | भावपूर्ण अभिव्यति ! निर्मला जी बधाई !!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 19, 2014

बहुत आभार आदरणीय वैधजी ,आपकी प्रतिक्रिया पढ़ कर अच्छा लगा . सादर , निर्मल

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 19, 2014

सच कहा विजयजी ,कविता में अंतर्निहित यही भाव हैं , सादर आभार निर्मल

yamunapathak के द्वारा
February 20, 2014

निरमला जी प्रत्येक पंक्ति बहुत कुछ कहती है .सुन्दर

Sonam Saini के द्वारा
February 20, 2014

नमस्कार मैम …….बहुत ही खूबसूरत कविता है …पढ़कर दिल वाह वाह करने लगा ….

deepakbijnory के द्वारा
February 20, 2014

AADARNIYA NIRMALA JI कविता तो कल्पना कि बात है फिर लिख दी जायेगी फिलहाल अपने हाथ कि केअर करें GET WELL SOON HAME INTEJAAR RAHEGA AAPKI RACHNAON KA

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 20, 2014

आदरणीय दीपक जी ,आप सब की दुआएं साथ हैं तो ज़ल्दी ही ठीक हो जाउंगी ,अभी भी एक हाथ से टाइपिंग कर के आपको धन्यवाद दे रही हूँ , सादर आभार

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 20, 2014

प्रिय सोनम ,कविता पसंद आई ,जानकर अच्छा लगा , खुश रहो ,शुभाशीष

Alka के द्वारा
February 22, 2014

आदरणीय निर्मला जी , बहुत सुन्दर रचना .. कभी साहिलों पे आकर तूफ़ान मिल गए .. क्या खूब कहा है .. बधाई..

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 22, 2014

बहुत धन्यबाद अल्काजी आपकी सराहना उत्साह वर्धक है . सादर आभार

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
February 22, 2014

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति हेतु बधाई

sadguruji के द्वारा
February 23, 2014

लाजबाब पंक्तियाँ-कभी बीच समुन्दर में किश्ती रही महफ़ूज़ कभी साहिलों पे आकर तूफ़ान मिल गए.बहुत अच्छी रचना.मेरी बधाई स्वीकार कीजिये.

Santlal Karun के द्वारा
February 23, 2014

आदरणीया निर्मला जी, कभी-कभी के सिलसिले का यह ग़ज़ल नुमा गीत ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव को बड़ी सिद्दत से बयाँ करता है | इसमें ‘उम्मीद के चिराग़’ भी हैं और ‘राह के जुगनू’ भी | इसमें ‘जमघटों की तन्हाई’ तो है ही ‘तन्हा ज़िन्दगी की दहशत’ भी है | इसमें एक तरफ ‘समुन्दर में महफ़ूज़ किश्ती’ है तो दूसरी तरफ ‘साहिलों के तूफ़ान भी | वस्तुत: द्वंद्व से भरी ज़िन्दगी की ख़ूबी को आप ने यहाँ कमाल की खूबसूरती से कहा है | … हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 23, 2014

परम आदरणीय संतलाल जी एवं सद्गुरु जी ,आपको मेरी रचना पसंद आई तो सार्थक हो गई ,मै इस मंच पर नवोदित ही हूँ ,आप जैसे स्थापित एवं सम्मानीय लेखकों के कुछ सराहना के शब्द ही मेरे लिए बहुत मान रखते हैं , आप दोनों की ह्रदय से आभारी हूँ ,सादर  …निर्मल

जितेन्द्र माथुर के द्वारा
December 4, 2014

कभी-कभी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की आपकी असाधारण योग्यता पर आश्चर्यचकित हो जाता हूँ । किसी बिछुड़े की स्मृति को मन में ले आती है आपकी यह कविता । एक कसक-सी उठती है मन में इसे पढ़ने के बाद । कभी-कभी जीवन इतना कठोर लगता है कि सहनशक्ति की सीमा टूटती-सी लगती है, ऐसे में कोई अपना बहुत याद आता है, विशेषतः तब जब वह दूर जा चुका हो । आपके काव्य की प्रशंसा के लिए मेरे पास समुचित शब्द नहीं हैं । क्या कहूँ ? कितना कहूँ ? आपकी तो प्रत्येक रचना उत्कृष्टता के नए मानदंड स्थापित करती दृष्टिगोचर होती है ।

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
December 4, 2014

आपका शुक्रिया जितेन्द्र जी, भावनाओं की नमी को कोई भावुक ह्रदय ही ज़ज्ब कर सकता है ,हार्दिक आभार .

Julz के द्वारा
October 17, 2016

Help, I’ve been informed and I can’t become igannrot.


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