भोर की प्रतीक्षा में ...

कविताएँ एवं लेख

52 Posts

903 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 16670 postid : 709614

संदेह क्यों कर .....निर्मला सिंह गौर

Posted On: 27 Feb, 2014 Others,कविता,Hindi Sahitya में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

अर्चना की आरती में दीप की लौ हो अस्थिर

तो भला व्रत की सफलता पर करें संदेह क्यों कर|

.

ये हवाएं भी हैं शामिल

मंदिरों के प्रांगणों में

है शहर का शोर भी तो

ध्यान के गुमसुम क्षणों में

शीर्ष से जो गिर गया श्रद्धा सुमन हो कर अस्थिर

तो भला आसक्ति की निष्ठा पे हो संदेह क्यों कर|

.

मन विहग गतिशील, चंचल

भावनाओं की है हलचल

है अधर मुस्कान शोभित

रिस रहा है नयन से जल

पार्श्व से जो आ रहे हैं आर्तनादों के करुण स्वर

तो ऋचाओं की महत्ता पर करें संदेह क्यो कर |

.

पी रहा जनजन निरंतर

विवशताओं का हलाहल

है कहीं ‘कर्तव्य’ बोझिल

तो कहीं है ‘मोह’ दलदल

यदि प्रदूषित जल भरा हो पात्रमें गंगा जली के

तो भला गंगा की पावनता पे हो संदेह क्यों कर ||

………………………………निर्मला सिंह गौर



Tags:           

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

25 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ranjanagupta के द्वारा
February 27, 2014

बहुत सुन्दर भाव निर्मला जी !बहुत बधाई !कवि की कल्पना का सामयिक सत्यापन !सादर !!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 27, 2014

धन्यवाद रंजना जी ,आपकी प्रतिक्रिया अमूल्य तो है ही अति प्रतीक्षित भी रहती है . सादर आभार

R K KHURANA के द्वारा
February 27, 2014

प्रिय निर्मला जी, पी रहा जनजन निरंतर विवशताओं का हलाहल है कहीं ‘कर्तव्य’ बोझिल तो कहीं है ‘मोह’ दलदल बहुत ही सुंदर कविता ! राम कृष्ण खुराना

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
February 28, 2014

हो गया आज मन गीत-गीत ! चन्दन से गंधित है प्रतीत !! मन-मंदिर की घंटियाँ बज उठीं | गीत की चेतना से मन लबरेज़ हो गया | निर्मला जी, इस सुन्दर गीत-रचना के लिए आप को पुनः-पुनः बधाई !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 28, 2014

आदरणीय खुराना जी आप की सराहना मेरे लिए उत्साह वर्धक है ,बहुत आभार आपका .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 28, 2014

इतनी सुंदर पंक्तियाँ ,  वाह !!!बहुत ख़ुशी हुई विजय जी आपकी लेखनी के को शत शत प्रणाम .सादर ,

deepakbijnory के द्वारा
March 2, 2014

वाह आदरणीय निर्मला जी अतुलनीय रचना : http://deepakbijnory.jagranjunction.com/2014/02/25/वृक्षारोपण-कविता/

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
March 2, 2014

bahut sundar bhavon ko shabdon kee mala me piroya hai aapne .aabhar

Ritu Gupta के द्वारा
March 2, 2014

बहुत सुंदर रचना ,आपकी सभी रचनाये उत्तम होती है निर्मला जी बधाई

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 2, 2014

रितु जी आपने मेरे ब्लॉग पर कवितायेँ पढ़ी और सराहना की, मेरे लिए उत्साह वर्धक है ,स्वागत है आपका .सादर ,आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 2, 2014

आदरणीय दीपक जी प्रतिक्रिया के लिए सादर आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 2, 2014

शिखाजी आपके शब्द बहुत सुंदर लगे ,कविता शब्दों की खूबसूरत माला ही तो होती है जिसे पिरो कर हम आप ,माँ सरस्वती की अनुकम्पा पाते हैं .बहुत आभार आपका

yamunapathak के द्वारा
March 3, 2014

निर्मला जी बहुत सुन्दर शब्द हैं SAABHAR

sadguruji के द्वारा
March 3, 2014

ये पंक्तियां बहुत विशेष हैं- मन विहग गतिशील, चंचल भावनाओं की है हलचल है अधर मुस्कान शोभित रिस रहा है नयन से जल पार्श्व से जो आ रहे हैं आर्तनादों के करुण स्वर तो ऋचाओं की महत्ता पर करें संदेह क्यो कर.बहुत भावपूर्ण और शिक्षप्रद रचना.आपको बहुत बहुत बधाई.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 3, 2014

आदरणीय सद्गुरु जी ,लेखनी  की महनत सफल .सराहना के लिए हार्दिक आभार ,सादर

sanjay kumar garg के द्वारा
March 4, 2014

“पार्श्व से जो आ रहे हैं आर्तनादों के करुण स्वर तो ऋचाओं की महत्ता पर करें संदेह क्यो कर” सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बधाई, आदरणीया निर्मला जी!

yogi sarswat के द्वारा
March 6, 2014

पी रहा जनजन निरंतर विवशताओं का हलाहल है कहीं ‘कर्तव्य’ बोझिल तो कहीं है ‘मोह’ दलदल यदि प्रदूषित जल भरा हो पात्रमें गंगा जली के तो भला गंगा की पावनता पे हो संदेह क्यों कर || वाह ! गज़ब के शब्द आदरणीय निर्मला जी !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 6, 2014

आपकी प्रतिक्रिया बहुत अमूल्य है सारस्वत जी ,सादर  आभार

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 6, 2014

आपकी प्रतिक्रिया प्रोत्साहन  देती है संजय जी ,लिखने के लिए जो जरूरी भी है ,हार्दिक आभार

अति सुंदर भाव परिपूर्ण सार्थक प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करे..सादर..

Daysia के द्वारा
October 17, 2016

Que no es optima? pues a mi me parecen estupendos!!!! eso es que somos pesotccifnireas a más no poder, y siempre andamos sacándonos defectos, pero creeme que desde fuera, se ven estupendos.Un abrazo.


topic of the week



latest from jagran