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क्यों करूं श्रंगार प्रतिदिन ...निर्मला सिंह गौर (अं.रा .महिला दिवस पर )

Posted On: 4 Mar, 2014 Others,Celebrity Writer,Hindi Sahitya में

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क्यों करूं श्रंगार प्रतिदिन

तुमको इस सौन्दर्य से

बढ़ कर

मेरे व्यक्तित्व से भी

प्यार होना चाहिए

है अगर सम्पूर्ण मन

मेरा तो मेरा

ये असुन्दर रूप भी

स्वीकार होना चाहिए |

.

वर्ष भर ये वसुंधरा

रहती नहीं

हरियाली ओढ़े

क्या बिना मख़मल के कोई

पग धरा पर

रखना छोड़े

एक क्षण यह सोच लेना

कैसे सहती

शीतलहरी

ज्येष्ठ रवि के

तीक्ष्ण शोले

भीगती सावन में

निसदिन

आसमा बरसाये ओले

क्या नहीं सहती धरा

फिर भी अधर

कुछ भी न बोले|

.

है तभी तारीफ़ जब तुम

सूखते पौधे के अंतर दर्द से

संतृप्त होकर,

जल नहीं उपलब्ध हो तो

अश्रु जल से

सींच डालो

और गले उसको लगालो

ये समझलो कि

तुम्हारा भी

किसी असहाय पर

उपकार होना चाहिए

है अगर सम्पूर्ण मन मेरा

तो मेरा

ये असुन्दर रूप भी

स्वीकार होना चाहिए |

.

सिर्फ़ ऊपर की चमक

करती है

आकर्षित उसी को

जो न मन के चक्षु खोले,

और न देखे ,

आंतरिक सौन्दर्य

मन मन्दिर का

क्या है

नयन क्यों भीगे

किसी के

क्या उसे अंतर व्यथा है

.

है तुम्हारी

द्रष्टि पैनी

तो परख लो

आंतरिक सौन्दर्य

महिला और

मही  का

नारी धरती की तरह

ममतामयी है

नारी के जीवन की पीड़ा

बाँट लो

उसको समझ लो

प्रेम कर लो

देखो फिर कैसा लुभाएगा

बिना श्रंगार के भी

रूप यौवन

ज्यों सुगन्धित

शुद्ध चन्दन

जैसे शीतल

श्वेत हिम कण

फिर तुम्हारे कर्म

आभूषण

नयन

दर्पण बनेगे

तब मुझे

महसूस होगा

कि इन्हीं आभूषणों से

अब मेरा

श्रंगार होना चाहिए|

क्यों करूं

श्रंगार प्रतिदिन

तुमको

इस सौन्दर्य से बढ़ कर

मेरे व्यक्तित्व से भी

प्यार होना चाहिए

है अगर सम्पूर्ण मन मेरा

तो मेरा

ये असुन्दर रूप भी स्वीकार होना चाहिए ||

……………………………………………निर्मला सिंह गौर



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35 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ritu Gupta के द्वारा
March 4, 2014

सुंदर रचना

sanjay kumar garg के द्वारा
March 4, 2014

“क्यों करूं श्रंगार प्रतिदिन तुमको इस सौन्दर्य से बढ़ कर मेरे व्यक्तित्व से भी प्यार होना चाहिए” नारी मन की सुन्दर अभिव्यक्ति! आदरणीया निर्मला जी! बधाई!

Madan Mohan saxena के द्वारा
March 4, 2014

बहुत खूब अच्छा लिखा है .आपकी लेखनी को नमन आभार मदन कभी इधर का रुख करें

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 4, 2014

उत्साह वर्धन के लिए सादर आभार रितु जी ,

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 4, 2014

सादर आभार मदन जी

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 4, 2014

संजय जी आपकी सराहना प्रेरणा दायक है ,सादर आभार

Pankaj Kumar Mishra Vatsyayan के द्वारा
March 4, 2014

इस सौन्दर्य से बढ़ कर मेरे व्यक्तित्व से भी प्यार होना चाहिए है अगर सम्पूर्ण मन मेरा तो मेरा ये असुन्दर रूप भी स्वीकार होना चाहिए || बहुत खूब कहा है आपनें। व्यक्तित्व की सुंदरता जो ना देख सके वो वास्तव में प्रेम नहीं कर सकता। मा अपनें बच्चे के रूप से नहीं, धन से नहीं, बस उससे प्रेम करती है। एक उत्तम रचना के लिए हार्दिक बधाई।

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 5, 2014

सही उदाहरन दिया पंकज जी आपने ,माँ -बच्चे का का सम्बन्ध ऐसा ही है दोनों ही एक दुसरे को सुन्दरतम महसूस करते हैं ,बहुत  बहुत हार्दिक आभार , सादर

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 5, 2014

आदरणीय मदनजी आपके पोस्ट पर कमेन्ट नहीं पोस्ट हो रहे .

March 5, 2014

ये असुन्दर रूप भी स्वीकार होना चाहिए | satya kaha nirmala ji .hridya ko chhoo gayi aapki prastuti .badhai

deepakbijnory के द्वारा
March 6, 2014

वाह निर्मला जी आपकी कविता पड़कर थॉमस ग्रे द्वारा लिखी TRUE BEAUTY “याद आ गयी ROSY CHEEKS AND CORAL LIPS CAN NOT BE DEFINED AS TRUE BEAUTY BECAUSE THEY ARE NOT PERMANENT

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 6, 2014

Thanks Deepakji ,is kavita ki rachana kahin pr ye pnktiyan padh kr hui hai , Beauty get the attention but personality captures the hearts . sadar aabhar

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 6, 2014

Thanks shalini ji ,aapki sarahna mere liye khas sthan rakhti hai ,sadar aabhar

nishamittal के द्वारा
March 8, 2014

भावपूर्ण प्रस्तुति पर बधाई और शुभकामनाएं निर्मला जी

yamunapathak के द्वारा
March 9, 2014

है तुम्हारी द्रष्टि पैनी तो परख लो आंतरिक सौन्दर्य महिला और मही का नारी धरती की तरह ममतामयी है नारी के जीवन की पीड़ा बाँट लो उसको समझ लो प्रेम कर लो देखो फिर कैसा लुभाएगा बिना श्रंगार के भी रूप यौवन ज्यों सुगन्धित शुद्ध चन्दन जैसे शीतल निर्मला जी एक एक शब्द मानो दिल को छोकर गहराई में उतरते गए ..बहुत ही सुन्दर

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 9, 2014

निशाजी प्रतिक्रिया के लिए आभार ,सादर

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 9, 2014

आप जैसे सुधी लेखकों की सराहना वास्तव में मेरे लिए बड़ा अवार्ड  है यमुना जी बहुत आभार आपका ,सादर

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
March 9, 2014

मन कंचन तन चन्दन-चन्दन ! पग-पग पर तेरा अभिनन्दन !! यही कामना है निर्मल जी ! जीवन हो बस नंदन-नंदन !! महिला-दिवस पर आप को ढेर सारी शुभमामनाएं !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 10, 2014

कैसे करूं आभार प्रदर्शन ,विजय जी आपकी लेखनी को शत शत नमन .सादर आभार

mrssarojsingh के द्वारा
March 10, 2014

बहुत सुंदर कविता लिखी है निर्मला जी आपने ..आज जब सब तरफ कृत्रिमता और बनावटीपन का ही बोलबाला है तब निर्मलऔर अंदरूनी सुंदरता का इतना प्यारा सा वर्णन मन को कहीं गहरे तक छू गया …….. मेरी ओर से ढेरों बधाइयाँ …….

mrssarojsingh के द्वारा
March 10, 2014

बहुत सुंदर कविता है बधाई स्वीकार करें ,,निर्मला जी

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
March 11, 2014

nari ke sachche saundary se parichay karaya hai aapne .badhai

kavita1980 के द्वारा
March 12, 2014

बहुत ही सुन् दर और प्रभावशाली प्रस्तुति नि र्मला जी नमन आपको और आपकी भावव्यन्जना को

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 12, 2014

बहुत अच्छा लगा प्रतिक्रिया पढ़ कर सरोज जी,इस बनावटी युग में नारी का नैसर्गिक एवं आंतरिक सौन्दर्य क्या है,देखने की अंतर द्रष्टि ही नहीं है,सादर आभार

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 12, 2014

धन्य वाद कविता जी ,आपकी प्रतिक्रिया के लिये हार्दिक आभार

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 12, 2014

जी हाँ शिखा जी ,पति के सत्कर्म से पत्नी का सम्मान श्रंगार होता है ,प्रतिक्रिया के लिए सादर आभार

jlsingh के द्वारा
March 12, 2014

कुछ कहने की जरूरत नहीं … हमें तुझसे और तुझे मुझसे प्यार होना चाहिए अंतिम निष्कर्ष मेरा और आपने तो सबकुछ कह ही दिया है. क्यों यह रचना मुझसे अछूती रह गयी मुझे खेद है आदरणीया निर्मला जी, सादर!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 13, 2014

आपका निष्कर्ष तो सत्यम शिवम् सुंदर है जवाहर सिंह जी,जीवन का मूल प्रेम हैऔर प्रेम में सब आत्मसात है.आपकी सारगर्वित प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार,सादर

Neha Verma के द्वारा
March 13, 2014

बहुत ही सुंदर कृति हैं। आपका बहुत-2 आभार… 

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 14, 2014

प्रिय नेहा कविता पर प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार एवं होली की शुभकामनायें .

Madan Mohan saxena के द्वारा
March 14, 2014

सिर्फ़ ऊपर की चमक करती है आकर्षित उसी को जो न मन के चक्षु खोले, और न देखे , आंतरिक सौन्दर्य बहुत सुन्दर मनमोहक शब्द , जितनी तारीफ कि जाये कम है बधाई हो और होली की शुभ कामना भी मेरी तरफ से

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 14, 2014

धन्यवाद मदनजी आपकी सुंदर प्रतिक्रिया उत्साहवर्धक है ,सादर आभार

sadguruji के द्वारा
March 21, 2014

है तुम्हारी द्रष्टि पैनी तो परख लो आंतरिक सौन्दर्य महिला और मही का नारी धरती की तरह ममतामयी है.बहुत अच्छी कविता.आपको बहुत बहुत बधाई.

sadguruji के द्वारा
March 21, 2014

बहुत अच्छी कविता.आपको बधाई.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 21, 2014

धन्यवाद आदरणीय सदगुरु जी आपकी प्रतिक्रिया के लिए . हार्दिक आभार


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