भोर की प्रतीक्षा में ...

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सांवली लड़की ---निर्मला सिंह गौर

Posted On: 1 May, 2014 Others,Celebrity Writer,Hindi Sahitya में

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भोर ने दी आगमन की सूचना कुछ इस तरह
पक्षियों की मधुर ध्वनि पायल के घुंगरू सी बजी
स्वप्न से जाग्रत अवस्था में पदार्पण हो गया जब
रवि की पहली रश्मि खिड़की की सलाखों पर पड़ी |
.
फिर हुई मध्यम सी दस्तक,नित्य से था भिन्न स्वर
दूध वाला तो सदा भोंपू बजाता है प्रखर
द्वार जब खोला तो थी इक ‘सांवली लड़की’ खड़ी
नयन पनियल थे मगर मुस्कान थी मोती जड़ी |
.
छींट के थे घाघरा चोली धुले सिकुडन भरे
नाप से ज़्यादा बड़े कंगन कलाई में पड़े
दूध की छोटी सी गगरी हाथ में पकड़े खड़ी
मैंने पूछा नाम तो शरमा के बोली ‘रावड़ी’|
.
उसने मुस्काकर कहे कुछ शब्द ज्यों घुंघरू बजे
जैसे अधरों पर बड़े अनमोल आभूषण सजे
बापू गये हैं बजरिया तब ही न आये हम यहाँ
अम्मा तनि बीमार है, भैया गया है पढ़्नवा|
.
थे अधर पुलकित नयन लज्जा से थे नीचे झुके
चाहती थी कुछ तो कहना, शब्द पर मुह पर रुके
दूध का बर्तन उड़ेला और इठला कर चली
लग रहा था बचपने के छोर पर जैसे खड़ी |
.
दूसरे दिन दूध वाला आया पहले की तरह
कल नहीं आने की मैंने पूछ ही डाली बज़ह
बोला देने के लिए लेने गए थे समनवा
अब बिटेवा हो गयी स्यानी, पठई दें, गवनवा |
.

गाँव के उस छोर पर खुशियों की रंगत छा गयी
गेरू चूना पुत गया, घर पर चमक सी आ गयी
लाल पीली पन्नियों की सुतलियाँ सब तन गयीं
साफ़ सुथरे चौक में भी चित्रकारी बन गयी |
.
चार छै दिन लोक गीतों की लहर थी रात में
और ढोलक की सुरीली सी धमक थी साथ में
रात में थी धूम पर सुबहा में हलचल थम गयी
‘रावड़ी’ रो कर विदा होकर के अपने घर गयी |
.
फिर हुआ मै भी प्रवासी चंद वर्षों के लिए
और जीवन के वही आयाम दोहराने लगे
एक सुन्दर संगनी अर्धांगिनी मेरी बनी
और दिन चर्या में परिवर्तन सुखद आने लगे |
.
चंद वर्षों बाद मै लौटा पुन: उस गाँव में
कुछ नहीं बदला वहां उस आसमाँ की छांह में
पहले जैसे खेत हरियाले, वही गौयें धवल
पेड़ कुछ ऊँचे हुए शाखें हुई थोड़ी सबल |
.
कुछ बरक्कत हो गयी थी लोगों से मालूम पड़ा
खुल गए थे मदरसे और सड़कों पे डामर चढ़ा
चंद पल बीते ही थे, वो दूध वाला आ गया
रिश्तेदारों से अधिक आत्मीयता दर्शा गया |
.
मै हुआ थोड़ा अचंभित साथ एक बच्ची खड़ी
‘सांवली लड़की’ पे उसकी हूबहू सूरत पड़ी
मैंने पूछा बाल-बच्चे तो मजे में हैं यहाँ
बोला साहिब हम गरीबों की भला किस्मत कहाँ |

.
प्रश्न वाचक द्रष्टि मेरी पढ़ के उसने ही कहा
काल ने बेवक्त मेरी बिटेवा को खा लिया
ये है बिटिया ‘रावड़ी’ की साथ मेरे आ गयी
इसकी माता प्रसव के पल मौत को अपना गयी |
.
मेरी ऑंखें नम हुई पर कर नहीं मै कुछ सका
‘सांवली लड़की’ का चेहरा मेरी आँखों में जगा
बेबसी में स्वयं था मै, शब्द सब बेअर्थ थे
उसके कंधे पर रखा बस हाथ, ढाढस व्यर्थ थे |
.
छोटी लड़की को उठा कर गोद में वो चल दिया
मेरे मानस पटल पर एक प्रश्न फिर दोहरा गया
‘सांवली लड़की’ दुबारा, क्या चहकती आएगी
अब गवनवा होयगा, यह सोच कर शर्मायगी|
.
हे ! प्रभु इन अशिक्षित लोगों को कुछ सद्ज्ञान दो
खेलने पढ़ने की वय में अब न कन्या दान हो
खेलने पढ़ने की वय में अब न कन्या दान हो ||
.
निर्मला सिंह गौर
(अक्षय तृतीया पर राजस्थान में हज़ारों मासूम बच्चों का विवाह कर दिया जाता है और प्रशासन ,कानून और समाज मूक दर्शक बना देखता रहता है )

sanwali ladki



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35 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjay kumar garg के द्वारा
May 1, 2014

आदरणीया निर्मला जी, अति सुन्दर अभिव्यक्ति बाल-विवाह जैसी कुप्रथा पर चोट करती हुई, आपका आभार व् धन्यवाद! मेरी और से ५ स्टार!

jlsingh के द्वारा
May 1, 2014

एक थीं कवियत्री जिनकी पंक्तियाँ मैंने पढ़ी अपनी बच्ची में वो थी देखती खुद को नयी आपकी कविता ने ऐसा कर दिया घायल मुझे किस तरह सम्मान दूँ मैं समझ आता न मुझे महादेवी महाश्वेता लेखिकाएं हैं कई देखती हैं दुर्दशा सर्वत्र हैं छाई हुई निर्मला जी, करूँ वंदन मैं सभी के सामने रख दिया है आपने दर्पण सभी के सामने …सादर अभिनंदन और सुन्दर कविता के लिए बधाई !

ranjanagupta के द्वारा
May 1, 2014

निर्मला जी!बहुत सुन्दर रचना ,और आपको इसकी बधाई !तथ्यों से भरी मासूम सवालों से घिरी रचना ! सादर !!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 1, 2014

आदरणीय जवाहर सिंह जी,तत्परित, जिन सुंदर पंक्तियों से आपने अपनी भावनाएं लिखीं है , मेरी साधारण भाषा में लिखी कविता का मान बढ़ गया है,तहे दिल से आपका बहुत बहुत शुक्रिया,आभार एवं शुभकामनाएं.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 2, 2014

आभार रंजना जी,बाल विवाह तो समाज में व्याप्त एसी बुराई है जिसका हर्जाना मासूम बच्चों को चुकाना पड़ता है,आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 2, 2014

बहुत आभार संजय जी,मेरी भावनाओं को जब भी कविता के रूप में प्रस्तुत करती हूँ,आप जैसे सह्रदयी पाठक पढ़ कर सराह देते हैं तो मेरी मेहनत सफल हो जाती है,आपका सादर अभिनन्दन .

OM DIKSHIT के द्वारा
May 3, 2014

आदरणीया निर्मला जी,बहुत ही सुन्दर भाव-युक्त,भाव -विभोर कर देने वाली पंक्तियाँ.वाह!अति प्रशंसनीय.

sadguruji के द्वारा
May 3, 2014

मेरी ऑंखें नम हुई पर कर नहीं मै कुछ सका ‘सांवली लड़की’ का चेहरा मेरी आँखों में जगा बेबसी में स्वयं था मै, शब्द सब बेअर्थ थे उसके कंधे पर रखा बस हाथ, ढाढस व्यर्थ थे |बहुत सुन्दर व् शिक्षाप्रद रचना ! आपको बधाई !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 4, 2014

धन्यवाद आदरणीय सदगुरुजी ,समाज की कुप्रथाओं के बारे में अक्सर मन विक्षुब्ध हो जाता है,कुछ भावनाएं शब्दों में ढल जातीं हैं, आपका बहुत आभार प्रतिक्रिया के लिए .सादर

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 4, 2014

ब्लॉग पर आपका अभिनन्दन है आदरणीय दीक्षित जी आपकी सराहना उत्साहवर्धक है ,सादर आभार .

yamunapathak के द्वारा
May 5, 2014

निर्मल जी बहुत ही प्रेरक और समाज को दिशा देने वाला ब्लॉग धन्यवाद

deepak pande के द्वारा
May 5, 2014

क्या बात क्या बात क्या बात हरिराय को झकझोर कर रख दिया इस कविता ने मानस पाताल प् अपनी चाप छोड़ कर चली गयी इस बुराई को मिटने का उपाय यही है पहले सबको शिक्षित करना होगा आदरणीय निर्मला जी

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 5, 2014

sadr सादर आभार दीपक भाई आपकी लेखनी अनवरत चलती रहे,और मुझे भी ऐसा होसला मिलता रहे ,मेरी यही कामना है ,हार्दिक अभिनन्दन .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 5, 2014

बहुत आभार यमुना जी ,कविता पर आपके विचार पाने की उत्कंठा बनी रहती है ,वक्त देने और उत्साह बनाये रखने के लिए आपकी शुक्रगुज़ार हूँ ,सादर शुभकामनायें .

alkargupta1 के द्वारा
May 5, 2014

निर्मला जी , पहली बार ही आपकी रचना पढ़ी और पढ़कर अभिभूत हुई समाज की बाल विवाह जैसी समस्या का इतनी सरल व सहज भाषा में इतना सुन्दर चित्रण …. अति प्रशंसनीय है उत्कृष्ट रचना के लिए बधाई

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 6, 2014

आदरणीय अल्काजी आपका मेरी हर रचना को इंतजार है ,ब्लॉग पर सदैव अभिनन्दन है ,सादर आभार आपका इतनी सुंदर प्रतिक्रिया के लिए .

May 6, 2014

बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति निर्मल जी .बधाई

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 6, 2014

धन्य वाद शालिनी जी ,बहुत आभार आपका .

kavita1980 के द्वारा
May 7, 2014

मन भीग आया निर्मला जी –बाल विवाह और उसकी परिनिति उभर कर आई है आपकी कविता में –अद्भुत

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
May 7, 2014

हे ! प्रभु इन अशिक्षित लोगों को कुछ सद्ज्ञान दो खेलने पढ़ने की वय में अब न कन्या दान हो खेलने पढ़ने की वय में अब न कन्या दान हो || आदरणीया निर्मला जी सुन्दर भाव , सुन्दर सीख, न जाने कहाँ अपना कानून और प्रशासन सो जाता है आँखें ही नहीं लगता है समाज का भी सहयोग चाहिए ही .. भ्रमर ५

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 7, 2014

देश में बहुत विकास हुआ है पर कुरीतियाँ अभी पूरी तौर पर ख़त्म नहीं हुई हैं,बाल विवाह आज भी बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है ,ये बात मन को बिक्षुब्ध करती है .आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 7, 2014

कविता जी आप स्वयं बहुत संवेदनशील हैं तो इस व्यथा को समझ रहीं है ,प्रतिक्रिया के लिए आभार .

pkdubey के द्वारा
May 8, 2014

बहुत मार्मिक वर्णन.आदरणीया मैडम जी.

yogi sarswat के द्वारा
May 8, 2014

गाँव के उस छोर पर खुशियों की रंगत छा गयी गेरू चूना पुत गया, घर पर चमक सी आ गयी लाल पीली पन्नियों की सुतलियाँ सब तन गयीं साफ़ सुथरे चौक में भी चित्रकारी बन गयी | . चार छै दिन लोक गीतों की लहर थी रात में और ढोलक की सुरीली सी धमक थी साथ में रात में थी धूम पर सुबहा में हलचल थम गयी ‘रावड़ी’ रो कर विदा होकर के अपने घर गयी | बहुत खूबसूरत शब्द आदरणीय निर्मला जी ! बेस्ट ब्लॉगर बनने पर हार्दिक बधाई !

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
May 8, 2014

खूबसूरत काव्यात्मक अभिव्यंजना ! निर्मला जी ! बधाई !1

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 8, 2014

सादर आभार विजय जी ,आप बहुत दिन बाद जे जे पर आये,आपकी रचानाओं की प्रतीक्षा है .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 8, 2014

कविता को पढ़ कर,उसका मर्म समझ कर,प्रतिक्रिया के लिए वक्त दिया उसके लिए आभार,सारस्वत जी ,हार्दिक शुभ कामनाएं.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 9, 2014

कोई बात जो मन को छू लेती है ,भावनाएं कविता के रूप में ही प्रकट होती हैं चि.पी के दुबे जी ,आपका आभार .

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
May 9, 2014

सार्थक भावाभिव्यक्ति हेतु आभार

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 9, 2014

धन्यवाद शिखाजी ,प्रतिक्रिया के लिए आभार .

Pankaj Kumar Mishra Vatsyayan के द्वारा
June 30, 2014

आदरणीय निर्मल जी आपको दैनिक जागरण के ब्लोग्गर पेज पर प्रकाशित होने की बधाई. आपकी रचनाएँ वास्तव में अत्यंत स्तरीय होती हैं, साहित्य की दुनिया के जिस स्वरूप का मैं पक्षधर hoon, आप उसी रूप को प्रस्तुत करती हैं . चार छै दिन लोक गीतों की लहर थी रात में और ढोलक की सुरीली सी धमक थी साथ में रात में थी धूम पर सुबहा में हलचल थम गयी ‘रावड़ी’ रो कर विदा होकर के अपने घर गयी | उक्त पंक्तियों को लिपिबद्ध करना गहन अनुभूति का परिणाम होती है . ज्यादा नहीं बस इतना की “आप एक उत्तम कोटि की रचनाधर्मी हैं .”

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 30, 2014

आपके शब्द ”आप एक उत्तम कोटि की रचनाधर्मी हैं ”पढ़ कर मुझे उतनी ही ख़ुशी हुई जितनी कि कोई अवार्ड मिलने पर होती है ,आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय पंकज जी .

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
July 29, 2014

निर्मला जी ,समयाभाव के कारण न पढ सका था लेकिन आज पढ कर महसूस हुआ कि कितनी खूबसूरत कविता के आनंद से वंचित रह जाता । यह प्यारी कविता हमेशा याद रहेगी । 

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 29, 2014

हार्दिक आभार आदरणीय बिष्ट जी ,आपको कविता पसंद आई ,हमारे देश की कुछ कुप्रथाएं आज भी जिंदा हैं ,बाल विवाह उनमे से एक है,जो मन के कोने में अक्सर चुभती रहती है ,प्रतिक्रिया के लिए आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 29, 2014

चि.अभिषेक ,आप जैसे युवक यदि साहित्य लिखते –पढ़ते हैं तो मुझे बहुत ख़ुशी होती है और अपनी कविता की ये पंक्तियाँ याद हो आतीं हैं कि ‘ जमघट में कुछ लोग तो होंगे जो कविताओं को समझेंगे ,शब्दों का भावार्थ पढेंगे ,ज़ज्वातों पर गौर करेंगे ,जमघट में कुछ लोग तो होंगे .——-और उन लोगों में एक आप भी हैं .बहुत अच्छी प्रतिक्रिया के लिए आभार और हार्दिक शुभ कामनाएं .


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