भोर की प्रतीक्षा में ...

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माँ ---निर्मला सिंह गौर (मदर्स डे पर स्व.माँ को समर्पित )

Posted On: 9 May, 2014 Others,Celebrity Writer,Hindi Sahitya में

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अपने स्त्रियत्व के दाइत्व निभाए उम्र भर
आस्था की भूमि पर परमार्थ बोये उम्र भर
भोर से संध्या तलक दुःख दर्द सबके बांट कर
तूने माँ आँचल के सब कोने भिगोये उम्र भर |
.
अपने पैरों की बिवाई की तुझे परवाह नहीं
अपने हाथों की कलाई की तुझे परवाह नहीं
पेड़, पक्षी, ढोर, याचक कोई प्यासा ना रहे
सबकी चिंता में घड़े भर भर उठाये उम्र भर |
.
भूंख के अहसास को चेहरे से पढ़ कर भांपना
ठण्ड लगने से ज़रा पहले ही कम्बल ढांपना
माँ तुझे ईश्वर कहूँ या दूत ईश्वर का कहूँ
दर्द मेरे, तूने क्यों आंसू बहाए उम्र भर |
.
चाँद, सूरज, पेड़, पर्बत सबकी करके अर्चना
निर्जला उपवास कर तुलसी के बिरवे सींचना
राहू , शनि, मंगल सभी के गर्म तेबर साध कर
घर की खुशियों के लिए दीपक जलाये उम्र भर |
.
घाव को सबसे छुपा कर, वेदना को भूल कर
मान मर्यादा की खातिर स्वार्थ का परित्याग कर
सिर्फ देना और ग्रहण के नाम पर बस टालना
माँ तेरे ये खेल तो ना समझ आये उम्र भर |
.
परिजनों का हित सदा करती थी तेरी अर्चना
सृजन में सौ फीसदी शामिल थी तेरी बेदना
हम सदा याचक रहे तेरे करों के दान के
तूने माँ मातृत्व के मोती लुटाये उम्र भर ||
निर्मला सिंह गौर



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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

May 9, 2014

घाव को सबसे छुपा कर, वेदना को भूल कर मान मर्यादा की खातिर स्वार्थ का परित्याग कर सिर्फ देना और ग्रहण के नाम पर बस टालना माँ तेरे ये खेल तो ना समझ आये उम्र भर | ekdam satya kaha nirmala ji .

jlsingh के द्वारा
May 10, 2014

भूंख के अहसास को चेहरे से पढ़ कर भांपना ठण्ड लगने से ज़रा पहले ही कम्बल ढांपना माँ तुझे ईश्वर कहूँ या दूत ईश्वर का कहूँ दर्द मेरे, तूने क्यों आंसू बहाए उम्र भर | बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण रचना निर्मला जी …मेरा तो मानना है – माँ की तुलना ही नही है आज इस संसार में हम सभी उलझे पड़े हैं अपने ही घर बार में. माँ की ऑंखें जोहती है सुवन उसको कद्र कर पुत्र भी निज फर्ज को भूले न अपने उम्र भर! ..सादर!

pkdubey के द्वारा
May 10, 2014

प्रत्येक पंक्ति में सागर जैसी गहराई.सादर बधाई आदरणीया.

ranjanagupta के द्वारा
May 10, 2014

निर्मला जी !बहुत ही सुन्दर सच्ची भावना माँ के लिए !और माँ सदा सबकी ऐसी ही तो होती है !त्याग और प्रेम की मुर्ति ,उसी का नाम माँ है !सद्भावनाएँ!!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 10, 2014

शालिनी जी आपको मेरी कविता पसंद आई तो मेरी भावनाओं को पोषण मिला ,सादर आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 10, 2014

बहुत बहुत धन्यवाद रंजना जी ,माँ तो बस माँ होती है ,आपका अभिनन्दन है .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 10, 2014

कविता की गहराई भी गहरी समझ रखने वाला ही जान सकता है ,आपका आभार चि. परवीन जी .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 10, 2014

आपकी पंक्तिया मेरी कविता को पूर्णता प्रदान कर रहीं हैं अगर आप इन पंक्तियों को कुछ और विस्तार देदें तो बहुत सुंदर कविता होगी ,आदरणीय जवाहर सिंह जी ,सच कहा आपने कि पुत्र को माँ के प्रति अपने फर्ज़ समझने चाहिए,बहुत आभार .

deepak pande के द्वारा
May 10, 2014

घाव को सबसे छुपा कर, वेदना को भूल कर मान मर्यादा की खातिर स्वार्थ का परित्याग कर सिर्फ देना और ग्रहण के नाम पर बस टालना माँ तेरे ये खेल तो ना समझ आये उम्र भर | वाह आदरणीय निर्मला जी इस अवसर पर दिवंगत माताश्री को सादर नमन

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 10, 2014

धन्यवाद दीपकजी अपनी माँ का प्यार हम सब के दिलों में और आशीर्वाद का साया सर पर जीवन भर बना रहता है,बहुत बहुत शुभ मंगल कामनाएं और हार्दिक आभार .

kavita1980 के द्वारा
May 10, 2014

बहुत सही कहा आपने भूंख के अहसास को चेहरे से पढ़ कर भांपना ठण्ड लगने से ज़रा पहले ही कम्बल ढांपना  कितने स्वाभाविक एहसास कितनी सरलता से कहे गए हैं –बधाई

मन की गहराइयों को छूती संवेदना से परिपूर्ण रचना..सादर..

alkargupta1 के द्वारा
May 11, 2014

निर्मल जी , माँ समर्पण ,त्याग व प्रेम की अनुकृति है माँ शब्द वर्णातीत , शब्दातीत है और है वर्णनातीत ऐसी माँ के रूप का बहुत ही सुन्दर शब्दों मैं बयां किया …उत्कृष्ट कृति

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 11, 2014

आभार कविता जी, माँ के लिए सभी की भावनाएं एक सी होतीं हैं बस शब्द अलग हो जाते हैं आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 11, 2014

आभार शिल्पाजी जुदा होकर भी माँ मन की गहराइयों में ही निवास करती है,आपका अभिनन्दन है .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 11, 2014

बहुत बहुत सादर आभार आदरणीय अल्काजी माँ के लिए आपकी भावनायें एवं उन भावनाओं को व्यक्त करने का शव्द शिल्प बहुत उत्कृष्ट है ,आपसे अभी बहुत कुछ सीखना है ,आपका अभिनन्दन है .

Sushma Gupta के द्वारा
May 11, 2014

आपकी यह रचना माँ के नाम है , जिसमे हर शव्द से माँ के होने का अब भी अहसास है, जो लाजवाव है.. वधाई ..

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 12, 2014

आदरणीय सुषमा जी ,ब्लॉग पर आपका अभिनन्दन है ,माँ मेरे ह्रदय में सदैव जीवित रहती है ,और शायद सभी के साथ उनकी माँ की स्म्रतियां जीवित रहतीं हैं ,आपने यह बात मेरी कविता से समझ ली ,बहुत आभार आपका .

sadguruji के द्वारा
May 13, 2014

परिजनों का हित सदा करती थी तेरी अर्चना सृजन में सौ फीसदी शामिल थी तेरी बेदना हम सदा याचक रहे तेरे करों के दान के तूने माँ मातृत्व के मोती लुटाये उम्र भर ||बहुत अच्छी रचना बधाई.माँ दुनिया की सभी कविताओं और कहानियो का सार कही जाती है.वन्देमातरम

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 14, 2014

आभार आदरणीय सद्गुरुजी ,आपने सच कहा माँ इस दुनिया में सृजन करती है ,सभी रचनाओं का सार है माँ .हार्दिक अभिनन्दन .

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
May 15, 2014

भूंख के अहसास को चेहरे से पढ़ कर भांपना ठण्ड लगने से ज़रा पहले ही कम्बल ढांपना माँ तुझे ईश्वर कहूँ या दूत ईश्वर का कहूँ दर्द मेरे, तूने क्यों आंसू बहाए उम्र भर | आदरणीया निर्मला जी बहुत प्यारी रचना माँ के मान में जितना लिखा जाए कम है माँ है तो हम हैं माँ को नमन …माँ की यादों से आँखें नम तो हो ही जाती होंगी …. भ्रमर ५

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 16, 2014

आभार सुरेन्द्र जी ,मेरी भावनाओं को समझ कर सराहना के शब्द कहने के लिए ,ब्लॉग पर आपका सदैव अभिनन्दन है .

Santlal Karun के द्वारा
May 16, 2014

आदरणीया निर्मला जी, मातृत्व कभी कुछ चाहता नहीं, वह तो सिर्फ़ अपनी छत्रछाया से सिंचन, पोषण और संरक्षण प्रदान करता है | सबसे बड़ी बात वह अपने बारे में कभी मुखर भी नहीं हो पाता | उसके स्नेह से पनपा पौधा ही उसके परम पावन कृतित्व का गान कर सकता है | इस गीत में माँ की पीड़ा, ममता, त्याग और उसकी महान रक्ष-चेतना के संवेदनात्मक पक्षों का मार्मिक रेखांकन किया गया है | इसके लिए आप को हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 16, 2014

आपकी प्रतिक्रिया का शब्द शिल्प पढ़ कर मन बहुत प्रफुल्लित हो गया आदरणीय संतलाल जी ,सच कहा आपने मातृत्व निस्वार्थ होता है,प्रकृति की तरह .सराहना के लिए हार्दिक आभार ,आपका ब्लॉग पर सदैव अभिनन्दन है ,सादर .


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