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पापा तुम याद आते हो तब ...निर्मला सिंह गौर

Posted On: 13 Jun, 2014 Others,Celebrity Writer,Hindi Sahitya में

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क्यों आती है स्मृति तुम्हारी
जब मन होता है कुछ भावुक
लगता है बस तुम मिल जाओ
और सुनाऊं तुमको सब कुछ ……पापा तुम याद आते हो तब |
.
बचपन में मुझसे होता था
जब भी कोई खिलौना विघटित
बेटी इनकी यही नियति है
तुम कह देते थे मुस्का कर
अब मेरा नन्हा सा ये मन
कोई तोड़ता जानबूझकर……पापा तुम याद आते हो तब |
.
जब छोटी सी कोई सफलता
बनती थी घर की दीवाली
उत्सव होगा, जश्न मनेगा
जीत आई है गुड़िया प्यारी
अब जब मेरी कोई सफलता
कर देती है सबको आहत ……पापा तुम याद आते हो तब |
.
जब मन के कोने में कोई
दुःख पनपा या दर्द उठा है
जब अपनों ने ज़ख्म दिए हैं
और गैरों ने उसे छुआ है
तब तब मुझको ये लगता है
आओ देखो पापा ये सब ……पापा तुम याद आते हो तब |
.
तुमने ही बचपन से मुझको
सर्व श्रेष्ट बनना सिखलाया
भले बुरे का भेद समझना
तुमने मुझे नहीं बतलाया
दुनिया तो दुनिया है पापा
हो जाता है कभी निरादर ……पापा तुम याद आते हो तब |
.
इस जीवन के जीर्ण सफर में
स्मृति एक तुम्हारी सुरभित
तुम्ही प्रेरणा श्रोत रहोगे
मेरे जीवन के दिग्दर्शक
जब भी सूर्य अस्त देखा और
जब भी आई रात भयानक ……पापा तुम याद आते हो तब ||
………………………………………………निर्मला सिंह गौर



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36 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
June 13, 2014

सहज और स्वाभाविक काव्यात्मक प्रस्तुति ! निर्मला जी बधाई !!

kavita1980 के द्वारा
June 13, 2014

बहुत ही संवेदन शील !मन को भिगो गई आपकी ये रचना -

deepak pande के द्वारा
June 13, 2014

atyant bhavuk samvednaon se bhari hui jaise jaise umra badti jati hai mata pita kee yaad aur बढ़ती jaati है सुन्दर भावपूर्ण prastuti

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 13, 2014

प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार आदरनीय विजय जी .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 13, 2014

बहुत बहुत धन्यवाद कविताजी ,भावनाएं जस की तस कलम बद्ध होती गईं ,आभार

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 13, 2014

सच कहा दीपक जी,उम्र बढ़ने पर उनकी और ज्यादा कमी लगती है ,प्रतिक्रिया के लिए सादर आभार .

sadguruji के द्वारा
June 14, 2014

जब मन के कोने में कोई दुःख पनपा या दर्द उठा है जब अपनों ने ज़ख्म दिए हैं और गैरों ने उसे छुआ है तब तब मुझको ये लगता है आओ देखो पापा ये सब ……पापा तुम याद आते हो तब | बहुत भावपूर्ण और सुन्दर कविता ! आपको बहुत बहुत बधाई !!

pkdubey के द्वारा
June 14, 2014

अब जब मेरी कोई सफलता कर देती है सबको आहत ……पापा तुम याद आते हो तब | सादर साधुवाद आदरणीया.बहुत सुन्दर कृति.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 14, 2014

हार्दिक आभार आदरणीय सद्गुरुजी आप जैसे लेखकों के सम्पर्क में रह कर सीख रही हूँ प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद .

sanjay kumar garg के द्वारा
June 14, 2014

“इस जीवन के जीर्ण सफर में स्मृति एक तुम्हारी सुरभित तुम्ही प्रेरणा श्रोत रहोगे मेरे जीवन के दिग्दर्शक” पिता को समर्पित सुन्दर कविता के लिए बधाई! आदरणीय निर्मला जी!

yamunapathak के द्वारा
June 14, 2014

yah bahut hee sundar kriti hai nirmala jee saabhar

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 14, 2014

बहुत बहुत धन्यवाद परवीन जी ,प्रतिक्रिया के लिए आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 14, 2014

धन्यवाद आदरनीय संजयजी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 14, 2014

आपके शब्द उत्साहवर्धक हैं यमुनाजी प्रतिक्रिया के लिए सादर आभार .

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
June 15, 2014

DIL KO CHOO GAYI AAPKI RACHNA .AABHAR

jlsingh के द्वारा
June 15, 2014

बहुत hee सुन्दर भाव पूर्ण रचना aadarneeyaa निर्मला जी –जब मन के कोने में कोई दुःख पनपा या दर्द उठा है जब अपनों ने ज़ख्म दिए हैं और गैरों ने उसे छुआ है तब तब मुझको ये लगता है आओ देखो पापा ये सब ……पापा तुम याद आते हो तब |

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 15, 2014

धन्यवाद शिखाजी ,प्रतिक्रिया के लिए आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 15, 2014

धन्यवाद जवाहरसिंह जी,माता पिता से सम्बंध ही भावना,प्यार और दर्द से जुडा रहता है और कभी ये ही भावनाएं शब्दों का रूप लेलेतीं है ,प्रतिक्रिया के लिए सादर आभार .

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
June 15, 2014

इस जीवन के जीर्ण सफर में स्मृति एक तुम्हारी सुरभित तुम्ही प्रेरणा श्रोत रहोगे मेरे जीवन के दिग्दर्शक जब भी सूर्य अस्त देखा और जब भी आई रात भयानक ……पापा तुम याद आते हो तब || आदरणीय निर्मल जी बहुत प्यारे भाव ..पिता का त्याग नेह कभी भुलाया नहीं जाना चाहिए ..भले बुरे का भेद भी तो वे बहुत कुछ समझा ही जाते हैं …पिता श्री को नमन भ्रमर ५

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 17, 2014

बहुत बहुत धन्यवाद सारस्वत जी ,सार्थक प्रतिक्रिया के लिए आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 17, 2014

आपकी बात सही है सुरेन्द्र जी ,माता पिता के उपकार को कौन भूल सकता है,प्रतिक्रिया के लिए आभार .

Shobha के द्वारा
June 17, 2014

दिल को छु लेने वाली कविता मेरे पिता जी बहुत जल्दी भगवान के पास चले गए थे एकएक पक्ति पढ़ कर मैने कष्ट पाया है ऐसे लगा जैसे मेरे दिल की आवाज हो पर मैं तो पोयम लिख नही सकती ऐसा भावुक मेरा मन नहीं है लिखना दुसरे के दिल की गहराई में उत्तर जाना ऐसी कला आपको मिली है शोभा

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 17, 2014

आदरणीय शोभाजी आप स्वयं बहुत अनुभवी लेखिका हैं ,मै आपकी पोस्ट जरुर पढ़ती हूँ .कविता ने आपके ज़ज्बात को छुआ और आपको पसंद आई तो मेरी कविता सार्थक हो गयी,प्रतिक्रिया के लिए सादर आभार .

deepika के द्वारा
June 21, 2014

मैने हाल ही मे अपने पिता को खोया है.कविता पढकर आंखे नम हो गई बीता समय याद आ गया.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 22, 2014

प्रिय दीपिका ,पढकर दुःख हुआ कि आपके पापा की कुछ दिन पहले मृत्यु हो गई ,आप भी मेरी तरह भावुक हैं ,अपने पापा के जाने के बाद मैंने ये कविता लिखी थी ,मृत्यु पर किसी का वस नहीं चलता ,स्वयं को सम्हालते हुए किसी भी काम में ,(जो भी आपकी हॉबी हो)व्यस्त रखिये ,कुछ ज़ख्म वक्त के साथ ही भरते हैं ,प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार .

आदरणीय निर्मला जी…मर्म को छूती सम्वेदनाओ से परिपूर्ण भावपूर्ण अभिव्यक्ति अतिसुन्दर..सादर

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 23, 2014

प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार शिल्पाजी .

shalinirastogi के द्वारा
June 23, 2014

हृदयस्पर्शी .. अत्यंत भावपूर्ण कविता … बधाई ऍ

yogi sarswat के द्वारा
June 23, 2014

तुमने ही बचपन से मुझको सर्व श्रेष्ट बनना सिखलाया भले बुरे का भेद समझना तुमने मुझे नहीं बतलाया दुनिया तो दुनिया है पापा हो जाता है कभी निरादर ……पापा तुम याद आते हो तब | .बहुत सुन्दर

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 23, 2014

ब्लॉग पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है शालिनीरस्तोगी जी ,प्रतिक्रिया के लिए आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 23, 2014

आपकी प्रतिक्रिया से रचनात्मकता को वल मिलता है आदरणीय सारस्वत जी ,हार्दिक आभार .

June 23, 2014

बहुत सुन्दर भावनाओं की अभिव्यक्ति .आभार

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 27, 2014

शालिनी जी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार .

Jitendra Mathur के द्वारा
November 14, 2014

आँखें भर आईं पढ़कर । ऐसा ही होता है पिता-पुत्री का रिश्ता । कविता का एक-एक शब्द मन को कहीं तल पर स्पर्श करता है । कोई पिता के स्नेह में पगी पुत्री ही ऐसी कविता का सृजन कर सकती है ।

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
December 2, 2014

पिता को समर्पित रचना के भाव सच में मन को भिगो ही देते हैं ,प्रतिक्रिया के लिए आभार जितेन्द्र जी .


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