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अहसास तो हो ...निर्मला सिंह गौर

Posted On: 26 Jun, 2014 Others में

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(ये कविता लगभग २५ वर्ष पूर्व लिखी थी )
हम हमारे हैं, हमें अहसास तो हो
कुछ पलों का वक़्त अपने पास तो हो
क्यों सदा खुशियों की रव से भीख मांगे
कुछ पलों के वास्ते उदास तो हों
कुछ पलों का वक़्त अपने पास तो हो |
.
जब निहारें यामिनी का रूप मोहक
जब अँधेरे हों, नहीं हो कोई दीपक
रात्रि के तम का पृथक अस्तित्व भी है
पूर्णिमा को छोड़ कर देंखें अमावस
क्यों सदा ही आश्रिता हों रौशनी पर
तिमिर के सौन्दर्य का आभास तो हो
कुछ पलों का वक़्त अपने पास तो हो |
.
जब हमारे होठों पर मुस्कान आये
कोई न पूछे हमें क्या सुख मिला है
जब हमारे नयन थोड़े भीग जाएँ
कोई न पूछे हमें किस से गिला है
चल पड़े हम बेसबब भेड़ों के पीछे
बैठ जाएँ थक के हम पेड़ों के नीचे
खूब डुबकी खाएं ,कूदें, तैर जाएँ
एक जलाशय भी हमारे पास तो हो
कुछ पलों का वक़्त अपने पास तो हो |
.
जब हमारा मन हमें निर्णय सुनाये
जब हमारा स्व हमें रस्ता दिखाए
जब हमारी हरकतें कोई न देखे
हों भले अस्वस्थ, वर्षा में नहायें
कोई ना पूछे कहाँ से आरहे हो
कोई ना टोके कहाँ पर जा रहे हो
ढोलकी ले कर उसे छत पर बजाएं
हम भी हैं आज़ाद ये अहसास तो हो
कुछ पलों का वक़्त अपने पास तो हो ||

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31 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ranjanagupta के द्वारा
June 26, 2014

बहुत सुन्दर निर्मला जी !आपने अपने भावों को बेहद सहजता से व्यक्त किया है ! आप को बहुत ,सदभावनाएँ !!

Shobha के द्वारा
June 26, 2014

आशा वादी कविता आप की सोच उस समय आज के किशोरों की सोच है बीएस एक बात और जोड़ दें’ मेरी मर्जी ‘ अति सुन्दर कविता आज की जेनरेशन के मन के भाव शोभा

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 27, 2014

आदरणीय शोभाजी सार्थक प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ये सच कहा आपने की उस समय की सोच और आज की पीढ़ी की सोच में कोई फर्क नहीं है,पर तब परिवार और सामाजिक प्रतिष्ठा के मज़बूत घेरे में रह कर सिर्फ सोच ही सकते थे ,पर आज की पीढ़ी के ज्यादातर युवा जो सोचते हैं वो करते हैं ,अब न समाज किसी को टोकता है न समाज का हस्तक्षेप कोई बर्दाश्त करता है .’मेरी मर्जी’ एकदम सही शब्द दिया है आपने सादर आभार.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 27, 2014

बहुत बहुत धन्यवाद रंजना जी ,ब्लॉग पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है ,आभार .

pkdubey के द्वारा
June 28, 2014

adbhut aadarneeyaaa. रात्रि के तम का पृथक अस्तित्व भी है.bhut divy sandesh.sadar badhai.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 28, 2014

बहुत बहुत धन्यवाद प्रवीण जी,यह कविता तब की है जब उम्र अनुभवहीन थी,प्रतिक्रिया के लिए आभार .

jlsingh के द्वारा
June 30, 2014

जब निहारें यामिनी का रूप मोहक जब अँधेरे हों, नहीं हो कोई दीपक रात्रि के तम का पृथक अस्तित्व भी है पूर्णिमा को छोड़ कर देंखें अमावस क्यों सदा ही आश्रिता हों रौशनी पर तिमिर के सौन्दर्य का आभास तो हो कुछ पलों का वक़्त अपने पास तो हो | मनोहारी कविता जो २५ साल बाद भी उतनी ही सुघर सन्देश देने में सक्षम है…. आज के दैनिक जागरण में प्रकाशन हेतु बधाई! सादर!

deepak pande के द्वारा
June 30, 2014

हम भी हैं आज़ाद ये अहसास तो हो कुछ पलों का वक़्त अपने पास तो हो waah nirmala jee in thode se shabdon me sab kuchh keh diyaa ye jewwan kee bhagdod me apne hee kuchh pal apnee hee khatir apne hee pass nahee hain

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 30, 2014

बहुत बहुत धन्यवाद दीपक जी ,कविता का मर्म यही है जो आपने लिखा है ,हार्दिक आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 30, 2014

बहुत बहुत धन्यवाद जवाहर लाल सिंह जी ,दैनिक जागरण में प्रकाशित होने की सूचना भी मुझे आपके कमेन्ट से मिली ,आपका सादर आभार .

एल.एस.बिष्ट के द्वारा
June 30, 2014

अच्छी भावपूर्ण कविता । कविता तो नही लिखता मूलतः सामयिक लेख व फीचर लेखक रहा हूं  लेकिन मेरा मानना रहा है कि खूबसूरत एहसास  और संवेदनाओं को किसी भी विधा मे पिरोया जाय मन को छूते हैं । सुन्दर रचना ।

Pankaj Mishra के द्वारा
June 30, 2014

आज आपकी रचना दैनिक जागरण में प्रकाशित हुई। अत्यंत ही उत्तम रचना।

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 30, 2014

आदरनीय बिष्ट जी सादर नमन ,ब्लॉग पर आपका अभिनन्दन है आपको कविता पसंद आई,मेरी रचनात्मकता को बल मिला ,प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 30, 2014

आभार पंकज जी आपकी प्रतिक्रिया के लिए और दैनिक जागरण में कविता के प्रकाशन की सुचना देने के लिए भी ,अनेक शुभकामनायें ,सादर .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 1, 2014

सार्थक प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद चि.सारस्वत जी .

sadguruji के द्वारा
July 3, 2014

जब हमारे होठों पर मुस्कान आये कोई न पूछे हमें क्या सुख मिला है जब हमारे नयन थोड़े भीग जाएँ कोई न पूछे हमें किस से गिला है !! बहुत भावपूर्ण और दिल को छूती हुई रचना ! अपने ही मन की बात लगती है ! पच्चीस साल पहले भी आप उतना ही अच्छा लिखती थीं,जितना आज लिखतीं हैं ! यही इस कविता की सबसे बड़ी विशेषता है !ये जानकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई ! बहुत बहुत बधाई !!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 3, 2014

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय सद्गुरु जी ,माँ सरस्वती की कृपा से बचपन से ही आत्म अभिव्यक्ति कर पा रही हूँ ,मंच पर आप सब सुधी लेखको की सद भावना और मार्ग दर्शन मिल रहा है ये मेरा सौभाग्य है .प्रतिक्रया के लिए सादर आभार .

Ritu Gupta के द्वारा
July 5, 2014

हमेशा की तरह एक ऊतम कविता बधाई हो निर्मला जी

आदरणीय निर्मला जी आपकी रचना पढ़ना स्वयं में सुखद एहसास होता है एक आशावादी दृष्टिकोण एवं बहुत ही सकारात्मक उर्जा और प्रेरणा से परिपूर्ण रचना..बधाई सादर..

yamunapathak के द्वारा
July 6, 2014

nirmala jee BAHUT HEE SUNDAR BHAVON SE YUKT KAVITA HAI

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 8, 2014

सार्थक प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद रितु जी ,सादर अभिनन्दन .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 8, 2014

बहुत बहुत धन्यवाद प्रिय शिल्पा जी ,आपकी प्रतिक्रिया पढ़ कर मन प्रसन्न हुआ ,हार्दिक आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 8, 2014

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय यमुना जी आपने प्रतिक्रिया के लिए अपना अमूल्य वक़्त दिया ,आभार आपका .

Sushma Gupta के द्वारा
July 10, 2014

मन के भावों का सुन्दर अवतरण है आपकी इस रचना में ..निर्मला जी.. वधाई

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 10, 2014

बहुत बहुत धन्यवाद सुषमा जी ,आपकी प्रतिक्रिया उत्साहवर्धक है सादर आभार .

Alexavia के द्वारा
October 17, 2016

That’s not just logic. That’s really sebsnile.


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