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बहारें आ गयीं...निर्मला सिंह गौर

Posted On: 14 Jul, 2014 Others,Celebrity Writer,Hindi Sahitya में

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पतझड़ों की पीर सहलाने बहारें आ गयीं
बागवां के दिल को बहलाने बहारें आ गयीं ,
पा के खोना , खो के पाना ज़िंदगी का चक्र है
दर्द का अहसास झुठलाने बहारें आ गयीं |
.
पक्षियों ने घोसलों की खूब मज़बूती बुनी
पेड़ ने नन्हें परिंदों की बहुत बातें सुनी
एक दिन पत्ते उन्हें छू कर जुदा होने लगे
पतझड़ी के वक़्त में ज़ज्बात को छूने लगे |
.
देखते ही देखते सब पेड़ गंजे हो गये
धूप के भी गर्म तेबर के शिकंजे हो गये
हो गयी छाया नदारद ,लू से मुरझाया चमन
तेज़ सूरज पी गया जल ,ताप से झुलसा बदन |
.
पर ये कुदरत अपनी बेरहमी पे शर्माने लगी
छा गए बादल, हवाओं में नमी आने लगी
क्या सुखद अचरज, नवांकुर फूट कर बाहर हुये
पेड़ के सूने बदन पर जैसे आभूषण सजे |
.
आ गया सावन फुहारों की झड़ी लगने लगी
गोरी सजधज कर, गगन की सुर परी लगने लगी
वृक्ष लहराने लगे नवपात में भीगे खड़े
सब्ज शाखें हो गयीं पुलकित,जहाँ झूले पड़े |
.
रंग,खुशबू और सुन्दरता का फिर जमघट लगा
सज़ गया सारा चमन,दुर्दिन का गम भी छंट गया
आसमां को रूप दिखलाने बहारें आ गयीं
दर्द का अहसास झुठलाने बहारें आ गयीं ||
……………………………………………………………..
निर्मला सिंह गौर



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38 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Pankaj Kumar Mishra Vatsyayan के द्वारा
July 15, 2014

प्रकृति का इतना सूक्ष्म चित्रण, निश्चित रूप से आप “आदरणीय” हैं और जो लोग कुछ भी लिखना चाहते उन लोगों के लिए उपयोगी होगा की वो लोग “आपकी रचनाएं पढ़ें ” . ===================================== देखते ही देखते सब पेड़ गंजे हो गये धूप के भी गर्म तेबर के शिकंजे हो गये हो गयी छाया नदारद ,लू से मुरझाया चमन तेज़ सूरज पी गया जल ,ताप से झुलसा बदन | ……………………………………………………… रंग,खुशबू और सुन्दरता का फिर जमघट लगा सज़ गया सारा चमन,दुर्दिन का गम भी छंट गया आसमां को रूप दिखलाने बहारें आ गयीं दर्द का अहसास झुठलाने बहारें आ गयीं || ==================================== पीड़ा और संघर्ष का इतना सहज वर्णन पता नहीं और कर भी पाये हैं या नहीं, पर आपनें तो कर ही दिया है .

sadguruji के द्वारा
July 15, 2014

बहुत सुन्दर प्रकृति का चित्र ! मन को छूती बहुत भावपूर्ण रचना ! आ गया सावन फुहारों की झड़ी लगने लगी गोरी सजधज कर, गगन की सुर परी लगने लगी वृक्ष लहराने लगे नवपात में भीगे खड़े सब्ज शाखें हो गयीं पुलकित,जहाँ झूले पड़े | लाजबाब पंक्तियाँ ! बहुत बहुत बधाई ! आपकी सुन्दर कृति से प्रभावित होकर शायद प्रकृति हमारे यहाँ भी वर्षा और प्राकृतिक सुंदरता दोनो साथ लेकर आये ! यहाँ तो सूखा पड़ा हुआ है !

pkdubey के द्वारा
July 15, 2014

प्रकृति के माध्यम से मानव को सर्वोत्तम सीख देती रचना ,आदरणीया.सादर नमन और आभार |

Shobha के द्वारा
July 15, 2014

निर्मला जी आप अति सुन्दर कविताये लिखती हैं मेरी समझ नहीं आता उनकी प्रशंसा में क्या- क्या लिखूं कई लाइनों maen बड़े ही कोमल भाव होते है सच कहू तो पूरी ही कविता ही गुलाब जैसी लगती है “दर्द का अहसास झुठलाने बहारें आ गई ” चरम सीमा है मेरे जैसी रूखी राजनीती शास्त्र की विद्यार्थी के लिए भाव में बात कहना शब्द नहीं मिलते शोभा

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 15, 2014

आपके शब्द मेरी रचनात्मकता के लिए संजीवनी हैं आदरणीय शोभाजी,सरल भाषा में लिखी मेरी कविताएँ आपके दिल तक पहुँच जाती है तो अवश्य ही आप साहित्य प्रेमी हैं और उच्च कोटि की बिदुषी भी हैं हीं ये आपके लेख बताते हैं .इतनी अच्छी प्रतिक्रिया का मै ह्रदय से अभिनन्दन करती हूँ,सादर आभार

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 15, 2014

आप की सार्थक प्रतिक्रिया का बहुत बहुत अभिनन्दन है ,चि.प्रवीण जी ,हार्दिक शुभ कामनाएं .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 15, 2014

आदरनीय सद गुरु जी ,सादर नमन ,मेरी कल्पनाओं में प्रकृति का सोंदर्य गहराई से बसा है जो अक्सर सरल भाषा में कविता के रूप में अभिव्यक्त होता रहता है,आप सब का आशीर्वाद है,सार्थक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 15, 2014

बहुत बहुत अभिनन्दन पंकज जी ,आप स्वयं बहुत गहन एवं भावपूर्ण कविता लिखते हैं,आपके सम्मान की अनुग्रहीत हूँ , प्रतिक्रिया के लिए ,हार्दिक आभार एवं शुभ मंगल कामनाएं ,सादर .

ranjanagupta के द्वारा
July 15, 2014

निर्मला जी !बहुत खुबसूरत प्र कृति चित्रण!भाव मन को छूकर निकले !अभी आपको बहुत आगे निकलना है !सादर !!

kavita1980 के द्वारा
July 16, 2014

कितना अच्छा लिखती हैं आप एकदम से अपने साथ बहा ले जाती हैं मानो लू के थपेड़े और बारिश की फुहारें ही महसूस कर रहे हों -6डी फिल्मों की तरह

Sushma Gupta के द्वारा
July 16, 2014

प्रकृति की मनोहारी अभिव्यक्ति निर्मला जी..वधाई

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
July 16, 2014

पा के खोना , खो के पाना ज़िंदगी का चक्र है दर्द का अहसास झुठलाने बहारें आ गयीं | निर्मला जी बहुत सुन्दर प्यारी सी कविता पढने का आनंद ही अलग है । प्रकृति के मौसमी चक्र को लेकर लिखी गई यह कविता बहुत अच्छी लगी ।

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 16, 2014

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय बिष्ट जी ,आपकी प्रतिक्रिया मेरी रचनात्मकता के लिए अत्यंत मह्त्ब पूर्ण है ,प्राकृतिक सौन्दर्य होता ही है आनन्ददायक, मेरी कविता का श्रंगार भी प्रकृति ने किया है तभी , आपके मन को लुभा सकी,ब्लॉग पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है,सादर आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 16, 2014

धन्यवाद सुषमाजी,प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 16, 2014

कविता जी आप ने मेरी कविता को जी लिया ,मेरी रचनात्मकता धन्य हो गयी ,बहुत खुश रहें आप और लिखतीं रहे ,आप स्वयं बहुत उत्क्रष्ट लिखतीं हैं ,बहुत बहुत आभार आपका .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 16, 2014

रंजना जी आपकी शुभ कामनायों का बहुत बहुत अभिनंदन है, आपके कुछ शब्द मेरे लिए अमूल्य रत्न हैं . आपका हार्दिक आभार .

sanjay kumar garg के द्वारा
July 16, 2014

आसमां को रूप दिखलाने बहारें आ गयीं दर्द का अहसास झुठलाने बहारें आ गयीं || दिल को छू लेने वाली अभिव्यक्ति के लिए आभार! आदरणीया निर्मला जी!

Krishna Kumar के द्वारा
July 16, 2014

निर्मला जी आपकी सुन्दर कृति से प्रभावित होकर शायद मै अपने आप को लिखने से रोक नही सका,  मेरी शुभकामनाये आपके साथ हैं, और आप अपने शब्द रुपी आशीर्वाद से हमेशा हमे अभिसिंचित करती रहें|

jlsingh के द्वारा
July 16, 2014

आदरणीया निर्मला जी, सादर अभिवादन! कव्वाली गाने वाले बीच बीच में इस तरह के शेर बोलते हैं और अंत में राग के साथ अन्तरा को गाते हैं …आपकी कविता या कहें शेर बिलकुल ऐसे ही हैं …ले और ताल के साथ गाने योग्य बेहतरीन प्रकृति चित्रण के साथ साथ जिंदगी से जोड़नेवाली रचना …बहुत बहुत बधाई …आजकल जागरण जंक्सन का साइट बड़ी मुश्किल से खुलता है इसलिए मुझसे अच्छी रचनाएँ छूट जा रही है. अन्यथा न लीजियेगा.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 16, 2014

सादर अभिवादन जवाहर सिंह जी ,आज कल जागरण जंक्शन खुलने में सबको ही समस्या आ रही है ,आपने कोई देर नहीं की कविता पढने में , आपकी प्रतिक्रिया अवश्य आएगी मुझे उम्मीद रहती है,प्रकृति तो विषय ही खूब सूरत है उस का जस का तस वर्णन कर दिया है सरल भाषा में ,बहुत बहुत आभार आपका .

anilkumar के द्वारा
July 16, 2014

आदरणीय निर्मला जी , प्रकृति के दर्पण में जीवन का प्रतिबिम्ब , बहुत सुन्दर ।  पर ये कुदरत अपनी बेरहमी पे शर्माने लगी छा गए बादल, हवाओं में नमी आने लगी बहुत बहुत बधाई ।

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 16, 2014

कृष्ण कुमार जी ,मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है ,पहली बार मेरी रचना पढ़ कर आपने अपने विचारों से अवगत कराया ,बहुत ख़ुशी हुई ,प्रतिक्रिया के लिए सादर आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 16, 2014

आदरणीय संजय जी ,कविता आपके दिल को भा गई ये जानकर ख़ुशी हुई ,प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक आभार .

deepak pande के द्वारा
July 17, 2014

खुदा करे आपकी जीवन में भी ये सकारात्मकता ये बहारें बनी रहे और आप हमें ऐसी ही रचनाओं से सराबोर करती रहे बहुत मन को हर्ष से प्रफुल्लित कर देने वाली रचना

Ritu Gupta के द्वारा
July 17, 2014

खूबसूरती से बयान करती हुई प्रकृति का गुणगान करती हुई सकारत्मक कविता बधाई

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 17, 2014

बहुत अच्छा लगा आपकी सार्थक प्रतिक्रिया पढ़ कर आदरनीय अनिल कुमार जी आपका तहे दिल से आभार ,सादर.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 17, 2014

आपकी उत्त्साह वर्धक प्रतिक्रिया का हार्दिक अभिनन्दन है आदरणीय रितु जी ,सादर आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 17, 2014

रचना पर सार्थक प्रतिक्रिया के साथ आपकी शुभ कामनाएं बहुत अनमोल हैं दीपक भाई ,आपका सादर आभार .

nishamittal के द्वारा
July 17, 2014

बहुत खूबसूरत रचना बधाई आपको आदरणीया

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
July 17, 2014

आ गया सावन फुहारों की झड़ी लगने लगी गोरी सजधज कर, गगन की सुर परी लगने लगी वृक्ष लहराने लगे नवपात में भीगे खड़े सब्ज शाखें हो गयीं पुलकित,जहाँ झूले पड़े | निर्मला जी सच बहार आ ही गयी ..बहुत सुन्दर शब्द बन्ध और प्यारे भाव …प्यारी रचना बधाई भ्रमर ५

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 18, 2014

बहुत बहुत आभार सुरेन्द्र जी आपकी प्रतिक्रिया अत्यंत उत्साहवर्धक है हार्दिक अभिनन्दन आपका .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 18, 2014

आदरणीय निशा जी नमन आपकी प्रतिक्रिया के लिए सादर आभार .कई दिनों से आपकी कमी खल रही थी ,ब्लॉग पर आपका अभिनन्दन है .

yamunapathak के द्वारा
July 18, 2014

निर्मला जी बहुत सुन्दर कविता है सच है सुख दुःख भी तो मौसम के बदलने की तरह ही चलते रहते हैं . sabhar

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 19, 2014

बहुत बहुत धन्यवाद यमुना जी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार .

yogi sarswat के द्वारा
July 22, 2014

देखते ही देखते सब पेड़ गंजे हो गये धूप के भी गर्म तेबर के शिकंजे हो गये हो गयी छाया नदारद ,लू से मुरझाया चमन तेज़ सूरज पी गया जल ,ताप से झुलसा बदन | . पर ये कुदरत अपनी बेरहमी पे शर्माने लगी छा गए बादल, हवाओं में नमी आने लगी क्या सुखद अचरज, नवांकुर फूट कर बाहर हुये पेड़ के सूने बदन पर जैसे आभूषण सजे | बहुत सुन्दर !

Alka के द्वारा
July 22, 2014

आदरणीय निर्मला जी , आपकी कविता पढ़ कर सच में मन बहार बहार हो गया | सुहावने मौसम का सजीव चित्रण ..

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 23, 2014

धन्यवाद अलका जी ,आपने मेरी कविता का सही रूप महसूस किया ,आपका हार्दिक आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 23, 2014

धन्यवाद सारस्वत जी,कविता की पंक्तिया आपके मन तक पहुँच सकीं ,प्रतिक्रिया के लिए आभार.


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