भोर की प्रतीक्षा में ...

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मुस्कुरा देना ज़रा ...निर्मला सिंह गौर

Posted On: 13 Oct, 2014 Others,Celebrity Writer,Hindi Sahitya में

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याद आएगी तुम्हारी मुस्कुराहट सुबह शाम
बाद मुद्दत के मिलो तो, मुस्कुरा देना ज़रा
अबके बिछुड़े कब मिलेंगे वक़्त ही बतलायेगा
वक़्त-ए-फ़ुर्सत याद करना, मुस्कुरा देना ज़रा |
.
कोई तारा आसमां से टूट कर गिर जाये तो
या कोई गुल खिलने से पहले ही मुरझा जाये तो
याद मत करना हमारी ऐसा मंज़र देख कर
तुम तो बस इक काम करना, मुस्कुरा देना ज़रा |
.
जब शमा बुझ जाए और बाक़ी अँधेरी रात हो
जब नहीं काबू में अपने आपके ज़ज्बात हों
जब ख़बर पहुंचे हमारी, रो नहीं देना कहीं
अश्क मत बर्बाद करना ,मुस्कुरा देना ज़रा |
.
मत बढ़ाना अपना दामन जब कफ़न की फ़िक्र हो
मत चढ़ाना फूल जब रस्मो-चलन का ज़िक्र हो
तुम नहीं आना जलाने शम्मा मेरी कब्र पर
क़ीमती सौगात देना , मुस्कुरा देना ज़रा |
.
लोगों का जो काम है ,वो कर दिखायेंगे ज़रूर
हर गली में एक अप्साना बनायेंगे ज़रूर
और पूछेंगे हसीं रुख्सार क्यों है ग़मज़दा
बात को तुम मत बढ़ाना ,मुस्कुरा देना ज़रा
………………………………………………..निर्मला सिंह गौर

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

amit shashwat के द्वारा
October 13, 2014

shabd bhle kam ho jaayen ,naa kam hon bhav jaraa …..:bhaavon ke khubsurat srijan ke liye bdhaai .

Shobha के द्वारा
October 14, 2014

प्रिय निर्मला जी आपने मुस्कराने की बात की है ‘ याद आएगी तुम्हारी , मुस्कराहट सुबह शाम —-में तो आपकी कविताओं को ढूँढती हूँ जब भी जागरण का रीडर ब्लॉग खोलती हों आप का ब्लॉग भोर की प्रतीक्षा देखती हूँ | बहुत सुंदर भाव पूर्ण कविता पढ़ कर सोचने को मजबूर हो जाती हूँ डॉ शोभा

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
October 14, 2014

आभार अमित जी ,सकारत्मक टिप्पणी के लिए ,मेरे ब्लॉग पर आपका अभिनन्दन है .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
October 14, 2014

प्रणाम आदरणीय शोभाजी ,आपको गज़ल पसंद आई तो मुझे ख़ुशी हुई ,भले ही थोड़ी ग़मगीन है पर मुझे अपनी ये रचना पसंद है ,किसी कहानी को पढ़ कर लिखी है जैसा अमूमन फिल्मो में गाना बीच में फिट कर देते हैं ,वही प्रयोग किया है ,आप स्वयं भावुक एवं कोमल ह्रदय हैं तभी आप मेरी भावनात्मक कविताये पसंद करतीं हैं ,अपना अमूल्य वक़्त देतीं हैं ,बहुत आभार आपका,सादर .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
October 14, 2014

योगी जी आपका हार्दिक अभिनन्दन है ,गज़ल पसंद करने के लिए सादर आभार .

sadguruji के द्वारा
October 14, 2014

मत बढ़ाना अपना दामन जब कफ़न की फ़िक्र हो मत चढ़ाना फूल जब रस्मो-चलन का ज़िक्र हो तुम नहीं आना जलाने शम्मा मेरी कब्र पर क़ीमती सौगात देना , मुस्कुरा देना ज़रा ! आदरणीया निर्मला सिंह गौर जी ! बहुत बहुत अभिनन्दन व बधाई ! ह्रदय को स्पर्श करतीं हुई आपके ह्रदय से निकली बेहद भावपूर्ण पंक्तियाँ ! इन पंक्तियों को पढ़कर मुझे साहिर लुधियानवी साहब के एक गीत के कुछ बोल याद आ गए-”कल और आएंगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझसे बेहतर कहने वाले तुमसे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझको याद करे क्यूँ कोई मुझको याद करे मसरूफ़ ज़माना मेरे लिये क्यूँ वक़्त अपना बरबाद करे !”

ranjanagupta के द्वारा
October 14, 2014

निर्मला जी ! सुन्दर और मार्मिक गजल !बहुत दिनों बाद !!अच्छी और खूबसूरत !सादर !! म

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
October 14, 2014

निर्मला जी मुस्कराहट  शोभा देती है रहस्यमय भी होती है   क्यों ईतना तुम मुस्करा रहे हो क्या गम है जिसको छूपा रहे हो । प्राण  विलन सी कूटिल भी होती है   मेरी तो मुस्रकराहट व्यंगात्रमक ही होती है  तभी ओम शांति शांति जप पाता हूॅ  

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
October 15, 2014

आदरणीय सद्गुरुजी आपने सही फरमाया ये ग़ज़ल ठीक इसी गीत के भाव लिए हुए है ,आपकी सार्थक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार .सादर .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
October 15, 2014

बहुत धन्यवाद रंजना जी ,आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए बहुत खास होती है , आपका हार्दिक आभार .

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
October 15, 2014

निर्मला  जी अभिवादन । क्या खूबसूरत कविता लिखी है आपने । शब्द नही हैं बयां करने  के लिए । किस एक लाइन कोट करूं कि यह सबसे अच्छी है , आपकी तो इस कविता का हर शब्द कीमती है । बस इतना ही कह सकता हूं कि बेहद खूबसूरत कविता का तोहफा दिया है आपने ।

राजीव उपाध्याय के द्वारा
October 15, 2014

बहुत सुंदर

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
October 15, 2014

हरिश्चंद्र जी सादर अभिवादन ,आपका वक्तव्य एकदम सही है ,मुस्कुराहट कई तरह की होती है ,आपने गज़ल पढ़ कर प्रतिक्रिया दी ,सादर आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
October 15, 2014

आपको रचना पसंद आ गयी तो मेरी लेखनी की यात्रा सार्थक हो गयी आदरणीय बिष्ट जी ,आपका हार्दिक अभिनन्दन है ,सादर आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
October 15, 2014

आपका ब्लॉग पर स्वागत है राजीव जी ,हार्दिक आभार .

jlsingh के द्वारा
October 18, 2014

जब शमा बुझ जाए और बाक़ी अँधेरी रात हो जब नहीं काबू में अपने आपके ज़ज्बात हों जब ख़बर पहुंचे हमारी, रो नहीं देना कहीं अश्क मत बर्बाद करना ,मुस्कुरा देना ज़रा | बहुत ही सुन्दर पंक्त्यिां, निर्मला जी, देर हो जाती है अक्सर मंच पर आने में भी, समझकर जज्बात केवल, मुस्कुरा देना जरा…सादर !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
October 18, 2014

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय जवाहर सिंह जी ,आपने वक्त निकाला और रचना पढकर प्रतिक्रिया दी ,दुआ है कि हम सब सदैव मुस्कुराते रहें और दीपोत्सव की शुभ मंगल कामनाएं .सादर .

sanjay kumar garg के द्वारा
October 18, 2014

“बात को तुम मत बढ़ाना ,मुस्कुरा देना ज़रा…” सुन्दर कविता के लिए बधाई व् आभार! आदरणीया निर्मला जी!

Alka के द्वारा
October 18, 2014

आदरणीय निर्मल जी बहुत सुन्दर मन को छूती रचना .. याद मत करना हमारी ऐसा मंजर देखकर , तुम तो बस एक काम करना मुस्करा देना जरा … बहुत खूब …

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
October 18, 2014

आपकी मुस्कान बहुत सुंदर है अल्काजी,सदैव मुस्कुराती रहें ,दीपावली की शुभकामनाये ,हार्दिक आभार

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
October 18, 2014

संजय जी दीपावली की शुभकामनायें ,प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार .

ashishgonda के द्वारा
October 26, 2014

जब शमा बुझ जाए और बाक़ी अँधेरी रात हो जब नहीं काबू में अपने आपके ज़ज्बात हों जब ख़बर पहुंचे हमारी, रो नहीं देना कहीं अश्क मत बर्बाद करना ,मुस्कुरा देना ज़रा | आज पहली बार आपको पढ़ने का सुसौभाग्य मिला बहुत ही ह्रदयस्पर्शी पंक्तियाँ भावुक कर दिया आपने……. बस इतना ही चाहूँगा कि- “आपके रचना की खुशबू हर तरफ फैले सदा, आपके दामन में गुलजार हों खुशियाँ सदा, जब भी पढ़ें आप मेरी इन पंक्तियों को, याद करके मुझको भी मुस्कुरा देना जरा…..”

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
October 27, 2014

धन्यवाद चि. आशीष जी बहुत सुंदर शब्द लिखे हैं आपने ,कोई स्तरीय कवि ही एसी प्रतिक्रिया दे सकता है ,मेरी शुभ कामनाएं हैं कि आपकी लेखनी अनवरत सुंदर रचनाएँ रचती रहे ,हार्दिक आभार .

Jitendra Mathur के द्वारा
November 12, 2014

लोगों का जो काम है, वो कर दिखाएंगे ज़रूर, हर गली में एक अफ़साना बनाएंगे ज़रूर । बिलकुल ठीक है लेकिन लोगों की टीका-टिप्पणी के भय से प्रेम करना कब रुक पाया है भला ? बहुत ही सुंदर कविता है निर्मला जी । प्रत्येक उस व्यक्ति की आँखें नाम कर देने में सक्षम है यह जिसने कभी किसी को हृदय से चाहा और फिर उसके विरह की पीड़ा को सहा । भावनाओं को छंद में पिरोने में आपका कोई सानी नहीं ।

Jacalyn के द्वारा
October 17, 2016

The truth just shines thurogh your post


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