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अवसादों के काराग्रह में ...निर्मला सिंह गौर

Posted On: 31 Oct, 2014 Others,Celebrity Writer,Hindi Sahitya में

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स्वप्नों के मदिरालय में हो मदहोश, सत्य झुठलाते हो
अवसादों के काराग्रह में निर्दोष कैद हो जाते हो |
.
चंचल पंछी बन कर नभ में उंचाई पर उड़ जाते हो,
फिर तेज़ हवा के झोंकों से भू पर आकर गिर जाते हो,
ब्रम्हाण्ड बड़ा ही विस्तृत है और पवन बहुत वलशाली है,
वसुधा के तरुण धरातल पर भी, देखो तो हरियाली है,
क्यों आंधी और तूफ़ानो में ही अपना नीड़ बनाते हो
अवसादों के काराग्रह में निर्दोष कैद हो जाते हो |
.
मन के धावक अश्वों पर चढ़ सरहदें लांघने जाते हो,
है द्रष्टिहीन गतिमान प्रेम, दीवारों से टकराते हो,
भावुकता की म्रगतृष्णा में अपना विवेक खो देते हो,
सीमाओं की मजबूती को स्वीकार नहीं कर पाते हो,
अपने स्व को लख कर परास्त,आघात लिए आ जाते हो,
अवसादों के काराग्रह में निर्दोष कैद हो जाते हो |
.
पत्थर को ऊंचाई पर रख जी तोड़ तपस्या करते हो,
लेकिन उस मूक,विवश,जड़ से वरदान की आशा करते हो,
आसक्ति दिखा कर इष्टदेव की शक्ति परीक्षा करते हो,
फिर ईश्वर को पत्थर कह कर,मन से निष्कासित करते हो,
है प्रेम का मतलब त्याग,मगर तुम तो सौदा कर जाते हो,
अवसादों के काराग्रह में निर्दोष कैद हो जाते हो ||
—————————————————निर्मल



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25 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
October 31, 2014

आसक्ति दिखा कर इष्टदेव की शक्ति परीक्षा करते हो, फिर ईश्वर को पत्थर कह कर,मन से निष्कासित करते हो, है प्रेम का मतलब त्याग,मगर तुम तो सौदा कर जाते हो, अवसादों के काराग्रह में निर्दोष कैद हो जाते हो ||……….बहुत सुदंर रचना ।

Ranjana Gupta के द्वारा
October 31, 2014

प्रिय निर्मला जी !बहुत बहुत बधाई !आपकी नई रचना सत्य का साक्षात् कराती है !मन और मनुष्य को नियंत्रित करना संभव नही !भले ही वह विनष्ट हो जाये !साभार !

jlsingh के द्वारा
November 1, 2014

अति सुन्दर! अलग भाव और प्रश्न करता मानव का असमंजस! बेहतरीन हार्दिक अभिनन्दन!

sadguruji के द्वारा
November 1, 2014

आदरणीय निर्मला सिंह गौर जी ! आपकी नई रचना पढ़ी ! हमेशा की भांति आपने बहुत अच्छा लिखा है ! सुख-सुविधा प्राप्त करने के लिए प्रकृति और ईश्वर का अधिकतम दोहन कैसे हो,मनुष्य ने सदा से ही ये प्रयास किया है ! प्रकृति तो जड़ है,परन्तु है वो पुरुष में ही समाहित ! पत्थर की मूर्तियां भी ईश्वर के ही भीतर हैं ! यही वजह है कि भक्तों की भक्ति के समक्ष नतमस्तक होकर पत्थर की मूर्तियों को भी बोलना पड़ा ! आपकी ये बात व्यवहारिक धरातल पर काफी हद तक सही है कि “आसक्ति दिखा कर इष्टदेव की शक्ति परीक्षा करते हो, फिर ईश्वर को पत्थर कह कर,मन से निष्कासित करते हो, है प्रेम का मतलब त्याग,मगर तुम तो सौदा कर जाते हो, अवसादों के काराग्रह में निर्दोष कैद हो जाते हो ||”आम आदमी को ये बात समझाने की जरुरत है कि देवी-देवताओं की मूर्तियां तो उनके प्राकट्य का एक माध्यम भर हैं,मूल चीज है निष्काम भक्ति ! आपके स्वास्थ्यलाभ की शुभकामना के साथ सादर अभिनन्दन और बहुत बहुत बधाई !

pkdubey के द्वारा
November 1, 2014

चंचल मन को एकाग्र करने के सन्दर्भ में बहुत श्रेष्ठ रचना आदरणीया.सादर आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 1, 2014

कविता की सराहना के लिए हार्दिक आभार आदरणीय बिष्ट जी ,ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहती है ,सादर .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 1, 2014

आपने एकदम सत्य कहा आदरणीय रंजना जी मन और मनुष्य पर नियंत्रण करना कठिन है और यदि मन आज कल के युवाओं का हो तो असम्भव ही है बस परिणाम स्वरूप उनकी बिक्षुब्ध स्थिति देख कर अफ़सोस होता है . प्रतिक्रिया के लिए आभार.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 1, 2014

सादर आभार आदरनीय जवाहर सिंह जी ,आपने सही आँका ,इस रचना में मैंने मानव के असमंजस एवं अत्यधिक महत्वाकांशी होने का सन्देश देने की कोशिश की है और बिक्षुब्ध वही होता है जो ज्यादा अपेक्षाएं रखता है ,कविता का मर्म जानकर प्रतिक्रिया देने का हार्दिक आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 1, 2014

आदरणीय सद गुरु जी ,प्रणाम ,ये रचना मैंने आज कल के नवयुवकों की ऊँची महत्वाकांक्षाओं ,क्षणिक प्रेम और अपेक्षाओं को देख कर लिखी है कि जब जीवन में संघर्ष मिलें तो भगवान् की भक्ति ,मन्नतें और ज्योतिष की ओर उन्मुख होते हैं ,पर अगर प्रारब्ध नहीं बदलता तो उनकी तरफ़ उग्र होते देर नहीं लगती साथ ही बिक्षुब्ध भी रहते हैं ,मेरा प्रयास है कि उनका जीवन के प्रति सकारात्मक नज़रिया हो और मनोवल मजबूत रहे ,आपने कविता को पढ़ कर सार्थक प्रतिक्रिया दी उसके लिए हार्दिक आभारी हूँ ,सादर .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 1, 2014

आभार प्रवीण जी ,रचना में मन को ही सम्हालने का आग्रह है .आपने सही समझा ,अभिनंदन है .

Pankaj Kumar Mishra Vatsyayan के द्वारा
November 2, 2014

मैं अकेला इस समय, जाने कहाँ मंजिल मेरी। जा रहा लेकर न जाने,किस दिशा और किस गली। चाहता है डूबना, ये नयन की झील में। चाहता है ये लिपटना, प्रीत वाली पीर से।। अत्यंत ही उत्तम अभिव्यक्ति, मन की वजह से उत्पन्न समस्याओं को सार्थक तरीके से प्रस्तुत किया है आपने।

sanjay kumar garg के द्वारा
November 3, 2014

“स्वप्नों के मदिरालय में हो मदहोश, सत्य झुठलाते हो अवसादों के काराग्रह में निर्दोष कैद हो जाते हो…” सुन्दर अभिव्यक्ति आदरणीया निर्मला जी! बधाई!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 3, 2014

कविता को सार्थकता प्रदान करने के लिए हार्दिक आभार आदरणीय संजय जी .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 3, 2014

ब्लॉग पर हार्दिक अभिनन्दन है ,बहुत दिन के बाद ब्लॉग पर आये , आभार आदरणीय पंकज जी ,आपकी चंद पंक्तिया बहुत सुंदर लिखी हैं ,धन्यबाद

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
November 3, 2014

sarthak bhavon kee sundar abhivyakti hetu badhai .

deepak pande के द्वारा
November 4, 2014

भावुकता की म्रगतृष्णा में अपना विवेक खो देते हो, सीमाओं की मजबूती को स्वीकार नहीं कर पाते हो, BAHOOT KHOOB AADARNIYA NIRMALA DEEDI

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 4, 2014

बहुत दिन बाद आये आदरणीय दीपक भाई ,मंच पर आपका स्वागत है ,प्रतिक्रियाके लिए हार्दिक आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 4, 2014

बधाई का शुक्रिया शिखाजी ,आपका अभिनन्दन है ,सादर .

Alka के द्वारा
November 6, 2014

आदरणीया निर्मला जी , बहुत दिनों बाद आप को पढ़ा .. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना … अपने स्व को लख कर परास्त ,आघात लिए आ जाते हो….

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 7, 2014

आपकी सार्थक प्रतिक्रिया का हार्दिक अभिनन्दन है अल्काजी ,सादर आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 7, 2014

बहुत बहुत आभार सारस्वत जी ,आज कल हम लोगों में समर्पण ,सहनशीलता और दूरद्रष्टि का आभाव है ,यही कुछ लिखने कि कोशिश की है कविता में,कि हमारी अपेक्षाएं हमें ज़्यादा डिप्रेशन देतीं हैं ,आपका हार्दिक अभिनन्दन है .

Jitendra Mathur के द्वारा
November 12, 2014

आपके चाहे या अनचाहे यह कविता अत्यंत सारगर्भित और गूढ़ बन पड़ी है जिसके मर्म को पूरी तरह से वही समझ सकता है जो कविता में संबोधित व्यक्ति की भांति भुक्तभोगी हो । जो जीने की कला सीख ले, उसके लिए सांसारिक जीवन का व्यापार सरल होता है अन्यथा जटिल बन जाता है और व्यक्ति को अवसाद के चक्रव्यूह में धकेल देता है । बहुत कुछ सोचने और मनन करने पर विवश करती है यह कविता । गागर में सागर की उपमा दी जा सकती है इसे ।

Shobha के द्वारा
December 5, 2014

बड़ी ही खूबसूरत सोचने पर विवश करने वाली कविता डॉ शोभा

Smiley के द्वारा
October 17, 2016

Your answer was just what I nedede. It’s made my day!


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