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तुम मुझे स्वीकार करो ...निर्मला सिंह गौर .

Posted On: 5 Nov, 2014 कविता,Hindi Sahitya,Others में

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तुम मुझे स्वीकार करो
मेरी जिद्दी प्रवृति के साथ
जो तुम पर पूरा
अधिकार जताती है
मेरी असुरक्षित मनोवृति के साथ
जो तुमको खोने के
विचार मात्र से डर जाती है |
.
तुम मुझे स्वीकार करो
उस पीड़ा के साथ जो
तुम्हारी संवेदना तलाशती है ,
उस ख़ुशी के साथ जो
बेकाबू होकर कुलाचें मारती है |
.
तुम मुझे स्वीकार करो
उन अक्षमताओं के साथ
जो ईश्वर ने मुझे दीं हैं मगर
उनके होने का अहसास नहीं दिया|
.

तुम मुझे स्वीकार करो
उन सक्षमताओं के साथ
जो ईश्वर ने मुझे नहीं दीं
मगर उनके होने का अहसास दे दिया |
……………………………………….निर्मल .



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27 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
November 5, 2014

निर्मला जी कविताएं तो नही लिखता लेकिन एक अच्छी रचना चाहे वह किसी भी विधा की हो मन को छूती है और अगर ऐसी कोई कविता / गीत / गजल / फीचर या लेख मन को अच्छा लगे तो समझए वह रचना अच्छी है । मेरा यही मापदंड रहा है रचना कर्म को समझने का । तकनीकी पहलू आलोचकों को समझना है । और आपकी यह रचना एक गहराई लिए हुए अच्छी रचना है । बस यूं ही लिखते रहिए \

अवी के द्वारा
November 5, 2014

निर्मला जी, ऐसा लगता है की मेरा मनोगत ही जैसे आपने लिख दिया| बरसों से यही मैं कहना चाहता था अपने प्रिय से| या शायद ये है मनोगत हर एक का| धन्यवाद! 

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 5, 2014

रचना कार से अधिक महत्व पाठक का होता है जो उस रचना का मर्म समझ कर उस रचना को स्वीकार करता है और आप भले ही कविता न लिखते हों पर आप उन भावनाओं को बखूबी समझते है जो कविता कि रचना करतीं हैं ये बहुत बड़ी बात है आदरणीय बिष्ट जी,आप ने अपनी ब्यस्त दिनचर्या से वक्त निकाल क्र कविता पढ़ी और प्रतिक्रिया दी ,आपका हार्दिक आभार ,सादर .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 5, 2014

ब्लॉग पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है अवी जी ,कविता में आपको अपना मनोगत नज़र आया तो लेखन सार्थक हो गया . आपका सादर आभार .

jlsingh के द्वारा
November 6, 2014

आदरणीया निर्मला जी, सादर अभिवादन! पूर्ण समर्पण!…इसे ही कहा जा सकता है और यह पूर्ण समर्पण भक्त अपने भगवान के साथ करता है या प्रेमी/प्रेमिका एक दूसरे के साथ. अगर मैं ठीक ठीक समझ पाया हूँ तो. अपने आपको पहचानना और स्वीकार करना एक स्वच्छ अनुभूति कही जा सकती है… बस मेरी इतनी ही समझ है… सादर

pkdubey के द्वारा
November 7, 2014

ऐसी पारस्परिक स्वीकृति ही किसी मित्रता या दाम्पत्य जीवन की सफलता का मूल होता होगा आदरणीया .सादर आभार .सुन्दर और महान लौकिक शिक्षा.

sanjay kumar garg के द्वारा
November 7, 2014

सुन्दर अभिव्यक्ति “तुम मुझे स्वीकार” एक अपनेपन का अधिकार जताती कविता! साभार! आदरणीय निर्मला जी!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 7, 2014

आपने एकदम सही अर्थ समझा कविता का आदरणीय जवाहर सिंह जी ,आप का आशय सही है,अपनी कमियों को स्वीकारने में जिंदगी सहज और खुशहाल हो जाती है,बैसे भी जो जिंदगी भर साथ रहता है आपकी अक्षमतायें बखूबी समझ जाता है,सादर.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 7, 2014

हम सब मनुष्य हैं तो हरेक में कुछ ख़ामियाँ होना स्वभाविक है ,यही मैंने स्वयं कबूल किया है कविता में,आपने सार्थक प्रतिक्रिया दी उसका हार्दिक आभार प्रवीण जी .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 7, 2014

सही लिखा है आपने ,यही सच्चाई ,समर्पण और ईमानदारी होना चाहिए प्रेम में चाहे वो ईश्वर के प्रति हो या मनुष्य के प्रति ,भावनाओं पर सहमती के लिए आभारी हूँ आदरणीय सारस्वत जी ,मेरी हर रचना पर आपके विचारों का स्वागत है,सादर आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 7, 2014

हार्दिक अभिनन्दन है , आदरणीय संजय जी ,सम्पूर्ण रचना के भाव यही तो हैं ,सार्थक प्रतिक्रिया के लिए आभार ,सादर .

जितेन्द्र माथुर के द्वारा
November 8, 2014

माननीया निर्मला जी,  इंटरनेट पर एकाएक आपके नाम के साथ आपकी रचना का संदर्भ देखकर मानो मन पर से एक भार उतर गया क्योंकि अरसे से आपके विषय में कुछ ज्ञात नहीं हो रहा था । आपकी रचना हृदयस्पर्शी है जिसे अनुभूत करना ही श्रेयस्कर है, व्याख्या करना नहीं । आपसे तो सदा श्रेष्ठ, उदात्त एवं संवेदनायुक्त सृजन की ही अपेक्षा रहती है । ईश्वर से प्रार्थना है कि आपको सदा स्वस्थ एवं शांतमना रखे तथा आपकी लेखनी को कभी थकने न दे । सादर, जितेन्द्र माथुर

Alka के द्वारा
November 8, 2014

निर्मला जी मन को छूती रचना .. बहुत सुन्दर व् भावुकता से परिपूर्ण .. सच कहा आपने प्यार. पूर्ण समर्पण है पूर्ण स्वीकारोक्ति है ..हम जैसे है वैसे ही एक दूसरे को स्वीकार करते है उन्हें जो हमारे बहुत करीब होते है ,,

Bhola nath Pal के द्वारा
November 9, 2014

” स्वीकारो मुझे, जो हूँ ,जैसी हूँ, वैसी ही i ” उत्तम अभिव्यक्ति i सहज ,सरल समर्पण रचना में माधुर्य घोलता है i ह्रदय से आभार ……

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 9, 2014

हार्दिक आभार आदरणीय जीतेन्द्र जी ,आपका ब्लॉग पर हार्दिक अभिनन्दन है ,अनेक शुभ मंगल कामनाएं .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 9, 2014

आभार आदरणीय अलका जी मेरे विचारों के समर्थन के लिए ,अनेक शुभ कामनाएं .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 9, 2014

ब्लॉग पर आपका स्वागत है आदरणीय भोला नाथ जी ,आप जैसे वरिष्ठ लेखकों कि सराहना भी तोहफ़े से कम नहीं होती ,आपका हार्दिक आभार ,सादर.

sadguruji के द्वारा
November 9, 2014

आदरणीया निर्मला सिंह गौर जी ! सादर अभिनन्दन ! दिन हुआ सरपट हिरन रातें नशीली हो गयीं, माँ के चहरे की लकीरें और गहरी हो गयीं ! उम्र छोटी पड़ गयी और रास्ते लम्बे हुए, राह में कुछ यात्रियों की म्याद पूरी हो गयी ! बहुत सुन्दर पंक्तियाँ ! जी..चौकिएगा मत ! सृजनमंच पर आपकी कवितायेँ पढ़ीं ! बहुत अच्छी लगीं ! सरल भाषा में शिक्षाप्रद और बहुत उपयोगी आपकी लेखनी को सलाम ! प्रस्तुत रचना की ये पंक्तियाँ बहुत विशेष हैं-तुम मुझे स्वीकार करो उन अक्षमताओं के साथ, जो ईश्वर ने मुझे दीं हैं मगर उनके होने का अहसास नहीं दिया ! आपकी रचनाएँ इस मंच रूपी गुलदस्ते में बहुत सुन्दर पुष्प के सदृश सजी हुई हैं ! ऐसी विचारणीय और उपयोगी रचनाओं की प्रस्तुति के लिए हार्दिक आभार !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 9, 2014

आदरणीय सद्गुरु जी ,प्रणाम – सृजन मंच पर रचना पढ़ कर यहाँ प्रतिक्रिया दी , ये आपकी सह्जता और बडप्पन है ,पर मुझे सुखद अनुभूति हुई .आप जैसे लेखक अच्छी पंक्तियों से उत्साह बढ़ा देते हैं , मंच पर आप सब मेरी रचनाओं को स्वीकार कर चुके हैं ,ये ही मेरा बड़ा अचीवमेंट है ,सार्थक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार ,सादर .

ranjanagupta के द्वारा
November 9, 2014

मुझे इसी भ्रम में रहना पड़ा दो तीन दिन क़ि मेरा कमेन्ट आप तक पहुँच गया होगा पर अफ़सोस ! कही गम हो गया !बहुत अच्छी लाइने है आपकी सुन्दर भावना मय कविता की और शिक्षा प्रद भी सादर !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 10, 2014

मुझे लगा कि आप अवश्य ही व्यस्त होंगी ,कोई बात नहीं मेरी कल्पना आप तक पहुंच गई और प्रोत्साहन मिल गया ये मेरी उपलव्धि है ,हार्दिक आभार आदरणीय रंजना जी .

Shobha के द्वारा
November 11, 2014

प्रिय निर्मला जी लगभग २२ दिन बाद टेलीफोन ठीक हुआ आज आपकी कविता पढ़ी बहुत अच्छी लगी आप अपनी पूरी क्षमताओं के साथ ऐसी प्रकार लिखती रहें हम पढ़ते रहें शोभा

shireeram के द्वारा
November 13, 2014

ye kavita nic hai mai inhe

meenakshi के द्वारा
December 2, 2014

क्या बात है सुन्दर भावात्मक रचना . मीनाक्षी श्रीवास्तव

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
December 4, 2014

बहुत दिन बाद आप मंच पर आयीं है ,आपका हार्दिक अभिनन्दन है आदरणीय मिनाक्षी जी ,प्रतिक्रिया के लिए आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
December 4, 2014

आपका आशीर्वाद है आदरणीय शोभाजी मै व्यस्तता की वजह से जे.जे पर कुछ पढ़-लिख नहीं सकी ,आपकी प्रतिक्रिया पढने में भी बिलम्ब हुआ ,पर सदैव आपका हर शब्द मेरी लेखनी को गतिमान करता है,उसके लिए मै आपकी आभारी हूँ ,सादर .


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