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कैसा है ये उत्थान ...निर्मला सिंह गौर

Posted On: 5 Dec, 2014 Others,social issues,Celebrity Writer में

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कैसा है ये उत्थान जहाँ शांत है बचपन
नादानियों शैतानियों का ज़ोर नहीं है
संगीत के नए नये आयाम बहुत हैं
बच्चों की चुलबुलाह्टों का शोर नहीं है |
.
कैसा है ये उत्थान जहाँ कृष्ण है गुमसुम
मुरली भी नहीं है यहाँ मक्खन भी नहीं है
ना नन्द को फुरसत है ना ख़ाली है यशोदा
कंधों पे पढाई का बोझ कम भी नहीं है |
.
कैसा है ये उत्थान जहाँ क्षुब्ध है यौवन
जीवन का लक्ष्य भी इन्हें मालूम नहीं है
अश्लीलता और ड्रग्ज ने गुमराह किया है
पूरब भी नहीं है यहाँ पश्चिम भी नहीं है |
.
कैसा है ये उत्थान कि हर ओर प्रदूषण
पक्षी भी नहीं हैं यहाँ जंगल भी नहीं हैं
हर साँस को लाले पड़े हैं शुद्ध पवन के
और प्यास बुझाने को यहाँ जल भी नहीं है |
.
कैसा है ये उत्थान जहाँ जिंदगी है गुम
अस्तित्व और व्यक्तित्व की पहचान नहीं है
सड़कों पे वाहनों की तरह भागता मानव
है यंत्रवत ऐसा कि उसमे जान नहीं है |
.
कैसा है ये उत्थान ????????????
निर्मल .



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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
December 6, 2014

प्रिय निर्मला जी किडनैपिंग के डर और बच्चों के भारी बसते में उनका बचपन खो गया प्रदूषन का यह हाल है शाम को सब कुछ धुंधला हो जाता हैं आपने वास्तविक धरातल पर अपने भाव प्रगट किये हैं वाकई यही कविता हैं जिसमें धरातल से जोड़ा गया हैं डॉ शोभा भारद्वाज

amitshashwat के द्वारा
December 7, 2014

uthaan to yantron kaa hota dikh raha hai ,manav to maatr yantr hua jaa raha hai .aapka chintan sahi hai .

sadguruji के द्वारा
December 7, 2014

कैसा है ये उत्थान जहाँ कृष्ण है गुमसुम मुरली भी नहीं है यहाँ मक्खन भी नहीं है ना नन्द को फुरसत है ना ख़ाली है यशोदा कंधों पे पढाई का बोझ कम भी नहीं है | आदरणीया निर्मला सिंह गौर जी ! बहुत सुन्दर और विचारणीय रचना ! बहुत अच्छी लगी ! आपका ह्रदय बहुत निर्मल है, इसलिए इतनी सुन्दर और प्रेरक रचनाएँ आपके मन में उतर आती हैं ! बहुत बहुत बधाई और इसे मंच पर प्रस्तुत करने के लिए हार्दिक आभार !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
December 7, 2014

प्रोत्साहन के लिए हर्दिक आभार आदरणीय शोभाजी ,आपकी प्रतिक्रिया पढ़ने के बाद मैंने भारी बस्ते का ज़िक्र भी कर दिया है कविता में ,आपका सादर आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
December 7, 2014

आपकी बात सही है अमित जी ,मानव यंत्रों की तरह संवेदन हीन होता जा रहा है ,सादर अभिनन्दन .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
December 7, 2014

आदरणीय सद गुरु जी -आपकी प्रतिक्रिया पढकर बहुत अच्छा लगा ,रचनाएँ काफ़ी हद तक लेखक की मनस्थिति का दर्पण होतीं हैं,मुझे आज कल के छोटे बच्चों में भी पढाई का तनाव और मासूमियत का अभाव नज़र आता है ,बजह हमारे समाज में बढ़ती असुरक्षा ,स्कूलों में प्रतिस्पर्धा या वर्किंग माता पिता ही क्यों न हों,पर बचपन खोता जा रहा है .मेरे शब्दों के समर्थन के लिए आपका हार्दिक आभार ,सादर .

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
December 7, 2014

निर्मला जी निर्मल मन से लिखा उत्थान कहीं मोदी जी के हाथ न लग जाये | जिस विकास के मार्ग पर पुरे जोश से दहाड़ते सम्पूर्ण विश्व भ्रमण कर रहे हैं कहीं उनकी हवा न निकल दे ओम शांति शांति

jlsingh के द्वारा
December 8, 2014

होंगे जनाब शायर फ़िराक या मिर्जा, हिंदी में लिखे गजल ‘निर्मल’ जी वही है. हर साँस को लाले पड़े हैं शुद्ध पवन के और प्यास बुझाने को यहाँ जल भी नहीं है बहुत सुन्दर आदरणीया निर्मला जी, आपका हार्दिक अभिनन्दन सच कहूँ, मुझसे गजल लिखा नहीं जाता काफ़िया मिसरा को सजाया नहीं जाता.

Jitendra Mathur के द्वारा
December 8, 2014

पूर्णतः सत्य हैं आपके द्वारा प्रकट किए गए ये विचार । अपने बच्चों पर पढ़ाई का गुरुतर भार देखकर मेरा हृदय उनके साथ ही रुदन कर उठता है । क्या लाभ है ऐसे जीवन का जिसमें जीवन के लक्षण ही दिखाई न दें, बच्चों के साथ उनका बचपन न रहे, मनुष्य का मनुष्यत्व ही खो जाए ? संभवतः आज के भौतिकतावादी युग ने अनचाहे ही हमें इस दौड़ में धकेल दिया है जिससे हम बाहर नहीं आ पाते क्योंकि जैसा परिवेश मिला है, उसी के अनुरूप ढलकर जीना एक विवशता है । मेरे जैसे संवेदनशील लोगों के लिए तो यह जीवन चिपटने वाला कंबल बन गया है । व्यक्ति कंबल को छोडना चाहता है लेकिन कंबल ही उसे नहीं छोडता । अत्यंत पीड़ादायक है यह लाचारी । आपके शब्द मुझे अपनी ही भावनाओं का प्रतिबिंब लगते हैं । बहुत-बहुत साधुवाद इस रचना के लिए ।

nishamittal के द्वारा
December 8, 2014

बहुत सुन्दर रचना, खो गया बचपन

pkdubey के द्वारा
December 8, 2014

बहुत सीधे तरीके से आप ने बहुत बड़ा सच लिखा.मैं विगत २ सप्ताह अपने गांव में गया था,ऐसा सोच रहा था ,बस यही बना रहूँ ,पर यह हो न सका ,सादर साधुवाद आदरणीया |

Sonam Saini के द्वारा
December 8, 2014

आदरणीय मैम नमस्कार …… कैसा है ये उत्थान ??? जैसा भी है बस यही है, वास्तव में मेरे विचार से तो यह उत्थान नही बल्कि प्रयोग है, उत्थान तो निश्चित होता है, जबकि यह तो अनिश्चित है, देखिये गा एक ऐसा अवश्य आएगा जब इंसान फिर से शुरू से शुरुआत करेगा …. घड़ा जब भरता है तो फुट जाता है, और जब फुट जाता है तो फिर नया घड़ा रखा जाता है, जो फिर से नए सिरे से शुरू से भरने लगता है …. आपकी कविता बहुत अच्छी और सच्ची है …

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
December 8, 2014

आपका ब्लॉग पर अभिनन्दन है आदरणीय हरिश्चंद्र जी ,आपकी प्रतिक्रिया सबसे हटकर होती है,मुस्कुराहट बिखेरते आपके व्यंग लेख भी अद्वतीय एवं खरे होते हैं,मेरी मामूली सी रचना अगर कुछ सुधार कर दे तो मेरी शब्द यात्रा सफल हो जाये ,हार्दिक आभार आपका ,सादर .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
December 8, 2014

आप जो लिखते हैं उसके लिए दिमाग की ज़रूरत होती है,काफ़िया मिसरा सजाने का काम तो कोई भी कर लेता है ,फिर भी उपरोक्त पंक्तियाँ पढ़ कर मन प्रसन्न हो गया,मेरी हार्दिक शुभ कामनाएं आदरणीय जवाहर सिंह जी ,सादर आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
December 8, 2014

आज के परिवेश का आपने बहुत सही उदाहरन दिया है आदरणीय जितेन्द्र जी ,व्यक्ति कम्बल छोड़ना चाहता है कम्बल उसे नहीं छोड़ता ,मैंने कहीं पढ़ा था पहले अभाव में खुशियाँ थीं अब खुशियों में अभाव है ,मेरी रचना के समर्थन के लिए हार्दिक आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
December 8, 2014

बहुत आभार आदरणीय निशा जी ,ब्लॉग पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
December 8, 2014

घर से महानगर की ओर लौटते वक्त मुझे भी ऐसा ही लगता है प्रवीण जी,पर जीवन में हर वक्त वो नहीं होता जो हम चाहते हैं ,कविता का मर्म समझ कर टिप्पणी देने के लिए हार्दिक आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
December 8, 2014

प्रिय सोनम बहुत दिनों बाद आप मंच पर आयीं ,आपने सच लिखा है घड़ा जब भर जाता है तो फुट जाता है,यह अनिश्चित है तभी तो दिमाग में प्रश्न चिन्ह है हम विकास की ओर जा रहे हैं या विनाश की ओर ? आपके विचारों का स्वागत है ,हार्दिक आभार .

sanjay kumar garg के द्वारा
December 10, 2014

सड़कों पे वाहनों की तरह भागता मानव है यंत्रवत ऐसा कि उसमे जान नहीं है… सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बधाई! आदरणीय निर्मला जी!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
December 11, 2014

आभार आदरणीय संजय जी मेरी रचनाओं पर आपकी प्रतिक्रिया का हार्दिक अभिनन्दन है .

deepak pande के द्वारा
December 12, 2014

Bahut khoob nirmala jee aaj ke pariprekshya me

deepak pande के द्वारा
December 12, 2014

Aadarniya nirmala didi kripaya meri rachnaon par bhee gaur farmayein deepakbijnory.jagranjunction.com/2014/12/12/%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a5%9c%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a5%9b/

sadguruji के द्वारा
January 2, 2015

आदरणीया निर्मला सिंह गौर जी ! सादर अभिनन्दन ! मैं आपको नववर्ष की बधाई देने आया हूँ ! आपको और आपके समस्त परिवार को नववर्ष की बहुत बहुत बधाई ! आपकी सुन्दर और सार्थक लेखनी नववर्ष में भी इस मंच पर अनवरत चलती रहे !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
January 2, 2015

नववर्ष की आपको भी अनेक शुभ कामनाएं आदरणीय सद्गुरुजी , नया साल आपके जीवन में भी खुशियाँ भर दे ,हम सब को आपके मार्ग दर्शन एवं प्रोत्साहन की बहुत ज़रुरत है,हार्दिक आभार .

ashishgonda के द्वारा
March 15, 2015

आदरणीया निर्मला जी! बहुत ही गंभीर विषय पर विचार योग्य रचना आज की विडम्बना का सीधा शब्द चित्रण…..

Gloriane के द्वारा
October 17, 2016

Knwleodge wants to be free, just like these articles!


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