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सफ़र---निर्मला सिंह गौर

Posted On: 1 Apr, 2015 Others में

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तिनका तिनका ज़र्रा ज़र्रा चप्पा चप्पा दरबदर
लम्हा लम्हा वक्त गुज़रा तनहा तनहा इक सफ़र
क़तरा क़तरा अश्क ढुलके शाम की तन्हाई में
रफ़्ता रफ़्ता हाथ से फिसली लड़कपन की उमर |
.
चार दूनी आठ होते हैं यही बस याद था
उम्र की बछिया ने मारी चौकड़ी दर लाँघ कर
ज़िंदगी कुछ और भी है जोड़ बाक़ी के सिवा
हम बहुत आगे निकल आये जो देखा घूम कर |
.
कनपटी के बाल कब उज़ले हुए मालूम नहीं
जब सफ़र पर मै चला था बाल न थे गाल पर
गांव की पगडंडियाँ थीं अजनवी की शक्ल में
बाद मुद्द्त के जो लौटा देखने मै अपना घर |
.
राह न भटकें क़दम और मंज़िलों पर हो नज़र
माँ की नरमी या पिता के सख्त रूख़ का था असर
अपनी ज़िद पर अड़ सकें इतना कहाँ साहस रहा
भाई, काका ,ताऊ ,दादा और बाबूजी का डर |
.
अपनी अपनी ज़िंदगी है अपने अपने फैसले
अपने अपने शौक़ हैं ,अपना है इक ज़ौक़े नज़र
देखते हैं जश्न ,जलवे ,दिल्लगी ,फरमाइशें
पर शिकायत कुछ नहीं, इक दर्द आता है उभर |
.
है तज़ुरवा बूढ़े बरगद को बदलते वक्त का
आसमा से ज़मीं तक जुङने का आता है हुनर
ज़र्द पत्ते हैं हमें ले जायगी इक दिन हवा
सब्ज़ पत्तो तुम चढ़ाओ यूँ न तूफानों को सर ||
………………………………………………………
निर्मल
.

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
April 1, 2015

प्रिय निर्मला जी बहुत समय बाद आपकी कविता पढ़ने को मिली आप जैसी ही खूबसूरत विचारों वाली कविता है बड़ी ही भाव पूर्ण लाइनें हैं “है तजुर्बा बूढ़े बरगद —तूफानों को सर’ पूरी कविता का अर्थ और जीवन का भी अर्थ इन्हीं मैं है डॉ शोभा

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
April 1, 2015

है तज़ुरवा बूढ़े बरगद को बदलते वक्त का आसमा से ज़मीं तक जुङने का आता है हुनर ज़र्द पत्ते हैं हमें ले जायगी इक दिन हवा सब्ज़ पत्तो तुम चढ़ाओ यूँ न तूफानों को सर बहुत सुन्दर भाव ..जिंदगी एक अबूझ पहेली और ये सच .. भ्रमर ५

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
April 1, 2015

Apka abhinandan hai respected shobhaji,I also missed you during those days ,thanks a lot for your love & comment.good night.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
April 1, 2015

bahut bahut aabhar bhramr ji for such a nice comment ,thanks.

Alka के द्वारा
April 2, 2015

आदरणीय निर्मला जी , बहुत सुन्दर सब्दों से सजा कर भावो की सुन्दर अभिव्यक्ति प्रस्तुत की है आपने है तजुर्बा बूढ़े बरगद को बदलते वक्त का आसमान से जमीन तक जुड़ने का आता है हुनर .. बहुत खूब

jlsingh के द्वारा
April 8, 2015

काफी दिनों बाद बेहतरीन रचना के साथ आपकी उपस्थिति श्लाघनीय है ..सादर!

Jitendra Mathur के द्वारा
April 11, 2015

आपकी तो प्रत्येक रचना के लिए ‘उत्कृष्ट’ के सिवा दूसरा कोई विशेषण सूझता ही नहीं । इस रचना में मुझ जैसे कितने ही व्यक्ति जो अब वार्धक्य में प्रवेश कर चुके हैं, अपने जीवन का प्रतिबिंब देख सकते हैं । आपकी प्रत्येक कृति को पढ़कर आपके बारे में यही बात समझ में आती है कि आपने जीवन को अत्यंत निकट से देखा है, समझा है, जाना है । अनेक दिवसों के उपरान्त आपकी रचना के माध्यम से मानो आपसे एक भेंट-सी हुई । यहाँ आपकी लंबी अनुपस्थिति और किसी भी रूप में आपसे संपर्क का अभाव मन में चिंताएं और आशंकाएं जगा रहा था । आप एक हृदयस्पर्शी कविता के साथ लौटी हैं । हार्दिक आभार और साधुवाद । जितेन्द्र माथुर

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
April 16, 2015

Bahut aabhaar jitendraji ,anekanek shubhkamnayen.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
April 16, 2015

aabhar aadrniy jawahar singh ji ,sadar abhinandan.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
April 16, 2015

Alka ji aapke comment manoval badha dete hain ,bahut bahut aabhar.

pkdubey के द्वारा
June 30, 2015

सारगर्भित काव्य ,सादर साधुवाद आदरणीया |


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