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माँ मेरी ...निर्मला सिंह गौर

Posted On: 9 May, 2015 Others में

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मेरी ज़िद जब जब मेरे आड़े आई है
माँ मेरी सच मुच मैंने ठोकर खाई है
भटका हूँ भूखा पूरे दिन जब भी मैंने
तेरे हाथ की परसी थाली ठुकराई है
माँ मेरी सच मुच मैंने ठोकर खाई है |
.
जब भी दुनिया ने मुझको बेबात सताया
आंसू पी कर तुझको मैं कुछ कह ना पाया
ममता का स्पर्श मेरे मस्तक पर दे कर
तूने अनकहे अंतर पीड़ा सहलाई है
माँ मेरी सच मुच मैंने ठोकर खाई है |
.
ठोकर खा कर जब भी मैंने चोट छुपाई
चेहरे पर भी दर्द नहीं ,मुस्कान सजाई
पर जैसे ही तुझ से मैंने आँख मिलाई
तेरी आँखें माँ मैंने भीगी पाई हैं
माँ मेरी सच मुच मैंने ठोकर खाई है .
…………………………………….निर्मल



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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bhagwandassmendiratta के द्वारा
May 10, 2015

हमेशा की तरह, मातृ दिवस पर माँ को समर्पित यथार्थपूर्ण एवं सुन्दर कविता बहुत बहुत साधुवाद

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 10, 2015

Aabhar aadarniy Bhagwan dass ji ,Thanks for such a nice comment.

jlsingh के द्वारा
May 10, 2015

अति सुन्दर! आदरणीया निर्मल जी काफी दिनों बाद आपने अपनी कविता दिखाई है, कविता पढ़ आँख में मेरे भी आाँसू आई है ..सादर! मातृ दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 11, 2015

Aabhar aapka aadrniy Jawaher singh ji Hraday ki gahrai me ma hamesha jeevit rahti hai .comment ke liye aap ka shukriya.

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
May 11, 2015

पर जैसे ही तुझ से मैंने आँख मिलाई तेरी आँखें माँ मैंने भीगी पाई हैं.. आदरणीया निर्मल जी माँ की ममता का , इनके बलिदान का कोई सानी नहीं कोई तुलना नहीं …. सुन्दर रचा आप ने हर माँ को सलाम भ्रमर ५

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
May 11, 2015

ममता का स्पर्श मेरे मस्तक पर दे कर तूने अनकहे अंतर पीड़ा सहलाई है… पर जैसे ही तुझ से मैंने आँख मिलाई तेरी आँखें माँ मैंने भीगी पाई हैं.. सुन्दर पंक्तियाँ आदरणीया निर्मला जी माँ की ममता का , इनके बलिदान का कोई सानी नहीं कोई तुलना नहीं …. सुन्दर रचा आप ने हर माँ को सलाम भ्रमर ५

Shobha के द्वारा
May 12, 2015

प्रिय निर्मला जी भुर प्यारी माँ को लेकर लिखी कविता यह लाईने दिल में घर करती हैं ठोकर खा कर जब भी मैंने चोट छुपाई चेहरे पर भी दर्द नहीं ,मुस्कान सजाई पर जैसे ही तुझ से मैंने आँख मिलाई तेरी आँखें माँ मैंने भीगी पाई हैं माँ मेरी सच मुच मैंने ठोकर खाई है .डॉ शोभा …………………………………….निर्मल

harirawat के द्वारा
May 12, 2015

निर्मला जी, अति भावात्मक करुण रस में सनी हुई, माँ को समर्पित कविता, गागर में सागर भरने जैसा है ! बधाई, शुभ कामनाओं के साथ, हरेन्द्र जागते रहो !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 12, 2015

आदरणीय भ्रमर जी आप की प्रतिक्रिया मनोबल बढ़ा देती है ,आपका आभार।

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
May 12, 2015

आदरणीय रावतजी ,आपका ब्लॉग पर हार्दिक अभिनन्दन है ,सादर आभार

sadguruji के द्वारा
June 2, 2015

ठोकर खा कर जब भी मैंने चोट छुपाई चेहरे पर भी दर्द नहीं ,मुस्कान सजाई पर जैसे ही तुझ से मैंने आँख मिलाई तेरी आँखें माँ मैंने भीगी पाई हैं! बहुत मार्मिक और सुन्दर रचना ! बहुत बहुत अभिनन्दन और बधाई ! काफी दिनों के बाद मंच पर आपकी उपस्थिति हुई है ! उम्मीद है अब बनी रहेगी !

Dayana के द्वारा
October 17, 2016

If my problem was a Death Star, this article is a photon todrepo.


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