भोर की प्रतीक्षा में ...

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संतुलन ---निर्मला सिंह गौर (विश्व पर्यावरण दिवस पर )

Posted On: 5 Jun, 2015 Others में

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जब हवा कुछ सर चढ़ी होने लगी
तो धरा की बेहतरी होने लगी
उड़ चले बादल मरुस्थल की तरफ
रेत भी थोड़ी हरी होने लगी |
.
कैद जब से हो गया नदिया का जल
तो धरा पर रात में दिन हो गया
बस गयीं लघु सूरजों की बस्तियां
चाँद का तेजस्व भी कम हो गया |
.
पर्वतों की शल्य जब से हो गयी
लोह ताम्बे की जमातें बिछ गयीं
कारखाने खा गए खलिहान को
रेल सड़कें खेत सारे डस गईं|
.
आम के बागान जब से कट गए
कोयलें भी बेसुरी होने लगीं
तितलियों के रंग धुंधले पड़ गए
जब गुलों की तस्करी होने लगी |
.
दौड़ में सब लोग शामिल हो गए
रिश्ते नाते भीड़ में सब खो गए
सोते बच्चे छोड़ निकला था सुबह
रात जब लौटा तो बच्चे सो गए |
.
ये तरक्की का सुखद अवतार है
अविष्कारों का बड़ा आभार है
प्यार कम और शौक सुविधाएँ अधिक
संतुलन भी तो यहाँ दरकार है
संतुलन भी तो यहाँ दरकार है |

……………………………………….निर्मल

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Sonam Saini के द्वारा
June 8, 2015

आदरणीय मैम सादर नमस्कार ……….बहुत ही ख़ुसूरती से लिखी गयी कविता ……एक ही साँस में पढ़ डाली मैंने, सच ही कहा आपने ” “दौड़ में सब लोग शामिल हो गए रिश्ते नाते भीड़ में सब खो गए सोते बच्चे छोड़ निकला था सुबह रात जब लौटा तो बच्चे सो गए” ये मेरी फेवरट लाइन हैं…. बाकि मुझे तो यही लगता है कि इंसान जितना आधुनिक होने का दिखावा कर रहा है वो उतना ही पिछड़ता जा रहा है ……इतनी सुन्दर कविता के लिए शुक्रिया मैम ………

Shobha के द्वारा
June 8, 2015

प्रिय निर्मला जी बेहद खूबसूरत कविता पहले बड़ी लम्बी प्रतिक्रिया दी थी परन्तु प्रतिक्रियाएं पहुंच ही नहीं रही हैं जब हवा कुछ सर चढ़ी होने लगी तो धरा की बेहतरी होने लगी उड़ चले बादल मरुस्थल की तरफ रेत भी थोड़ी हरी होने लगी | प्रकृति की खूबसूरती बाद तरक्की के साथ खूबसूरत सामंजस्य जोड़ा है ये तरक्की का सुखद अवतार है अविष्कारों का बड़ा आभार है प्यार कम और शौक सुविधाएँ अधिक संतुलन भी तो यहाँ दरकार है संतुलन भी तो यहाँ दरकार है आपकी रचना देख कर बहुत ख़ुशी हुई

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 8, 2015

प्रिय सोनम बहुत ख़ुशी हुई की तुमको कविता की वो पंक्तियाँ पसंद आयीं जो मैंने बॉम्बे के आमो-खास आदमी की दिनचर्या को देख कर लिखीं हैं ,हार्दिक अभिनन्दन ,खुश रहो .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 8, 2015

आदरणीय शोभाजी हार्दिक आभार ,आपने पहले जो प्रतिक्रिया दी वो मुझे नहीं मिली ये जानकर दुःख हुआ ,आपके लिखे शब्द मुझे बहुत आत्मबल देते हैं ,फिर भी आपने ये जो प्रतिक्रिया दी है ये भी बहुत खूबसूरत है ,सादर धन्यवाद .

sadguruji के द्वारा
June 8, 2015

दौड़ में सब लोग शामिल हो गए रिश्ते नाते भीड़ में सब खो गए सोते बच्चे छोड़ निकला था सुबह रात जब लौटा तो बच्चे सो गए | आदरणीया निर्मला सिंह गौर जी ! बहुत सुन्दर और विचारणीय कविता ! बहुत बहुत अभिनन्दन और बधाई ! कुछ दिनों के लिए मंच से गायब रहने वाली आपकी समाधी बहुत सुन्दर और नवीन विचार मंच पर ले के आती है ! हर चीज से आदमी कुछ समय के लिए ऊब जाता है ! कल्पना और आदर्श प्रस्तुत करते करते लेखक थक जाता है ! लेखक यदि सच लिखे तो कभी मित्र नाराज होते हैं तो कभी पाठक ! फ़िलहाल अभी लेखन के लिए मैंने भगवान को पकड़ा हुआ है ! सादर आभार !

sadguruji के द्वारा
June 8, 2015

आदरणीया..इस मंच पर कमेंट भेजना सबसे मुश्किल काम है ! कई दिन बाद आज भेजने पर सफलता मिली है ! इसके लिए बधाई आपको और मुझे भी..!

jlsingh के द्वारा
June 9, 2015

मैं तो सबसे पहले इस कविता पर प्रतिक्रिया देना चाह रहा था पर तब यह सम्भव नहीं हो रहा था पता नहीं जे जे वाले कब इस समस्या से निजात दिलवायेंगे. बहुत खूबसूरती और संतुलित शब्दों के साथ लिखी गयी कविता मनोहारी और प्रेरणदायक है ये तरक्की का सुखद अवतार है अविष्कारों का बड़ा आभार है प्यार कम और शौक सुविधाएँ अधिक संतुलन भी तो यहाँ दरकार है संतुलन भी तो यहाँ दरकार है |…सादर!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 16, 2015

आदरणीय जवाहर सिंह जी ,आपने कविता पढ़ कर अपने विचार लिखे ये ही बड़ी बात है ,मै देर से पढ़ पाई क्यों की यहाँ नेट की प्रॉब्लम चल रही है ,आपका हार्दिक अभिनन्दन है ,सादर .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 16, 2015

आपके विचारों से मै पूरी तरह सहमत हूँ आदरणीय सद्गुरु जी और दरसल कुछ ज़्यादा ही व्यस्त हूँ आजकल कि मेरी अपनी हॉबी (लिखने -पढने की) सबसे ज़्यादा नज़र अंदाज हो रही है ,कुछ यहाँ नेट ही नहीं आता है ,आपने रचना की सराहना की आपका हार्दिक आभार ,सादर .

Amelia के द्वारा
October 17, 2016

A little rationality lifts the quality of the debate here. Thanks for cogibtrutinn!


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