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साया --- निर्मलासिंह गौर

Posted On: 26 Aug, 2015 Others में

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साये का क्या बुज़ूद है जब तब सिकुड़ गया
सुबह से हुई शाम तो मुझ से बिछुड़ गया |
.
जब भी सफर में साथ में शामिल हुए कुछ लोग
उस भीड़ में साया मेरा पैरों कुचल गया |
.
आंधी से तो लड़ता रहा वो मेरे साथ साथ
बरसात में न जाने कहाँ जा कर छुप गया|
.
कोई तो बराबर का मेरा हमसफर बना
पर धूप ने तो साये का क़द ही बदल दिया |
.
गर्दिश में कोई साथ नहीं देता दोस्तों
आई जो रात मुझको छोड़ कर के चल दिया |

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
August 26, 2015

सरल शब्दों में गहन साहित्य लिखना ,महान साहित्यकार का श्रेष्ठ परिचय है ,आदरणीया |सादर आभार और नमन |

Jitendra Mathur के द्वारा
August 27, 2015

गर्दिश में कोई साथ नहीं देता । सच ही है, अंधकार में तो अपना साया भी साथ छोड़ देता है । बहुत अच्छी कविता लिखी है आपने । हार्दिक अभिनंदन ।

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
August 28, 2015

आपका हार्दिक आभार प्रवीण जी ,आपका ब्लॉग पर सदैव अभिनन्दन है ,अनेक शुभ कामनाएं .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
August 28, 2015

गर्दिश में कोई साथ नहीं देता —इसी बात ने इस कविता का सर्जन किया है मैंने कुछ खास नहीं किया ,प्रतिक्रिया के लिए आभार जितेन्द्रजी.

sadguruji के द्वारा
August 28, 2015

आदरणीया निर्मलासिंह गौर ‘निर्मल’ जी ! सादर अभिनन्दन ! इस रचना के लिए बधाई नहीं दूंगा, क्योंकि ये रचना आपकी अनुपम कवित्व क्षमता के अनुरूप नहीं है ! आपने काफी परिश्रम किया है ! रचना में भाव आया है, परन्तु लय गायब है ! ऐसा हो जाता है ! हर रचना सर्वोत्कृष्ट नहीं हो सकती है ! शुभकामनाओं सहित !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
August 29, 2015

आपने रचना पढ़ी और अपनी निष्पक्ष प्रतिक्रिया दी ,आपका हार्दिक आभार आदरणीय सद्गुरुजी ,मै आपकेकहे अनुसार आगे से सुधार का प्रयत्न करूंगी .सादर .

jlsingh के द्वारा
August 30, 2015

मैं तो वाह वाह ही करूंगा साया के साथ आँख मिचौली को जीवन के विभन्न पहलुओं से जोड़ने की कोशिश भी नायाब है!

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
August 31, 2015

मेरे विचार से जिन्दगी में भाग्य या खुशियाँ साये की सूरत होतीं हैं ,और दुःख –बरसात ,धूप और रात की तरह होते हैं,दुःख मुश्तकिल होते हैं और खुशियाँ क्षणिक होतीं हैं ,आपने कविता की अन्तर-आत्मा को पढ़ लिया ,आदरणीय जवाहर सिंह जी ,वाह वाह तो मै करती हूँ ,हार्दिक आभार .

Shobha के द्वारा
September 8, 2015

साये का क्या बुज़ूद है जब तब सिकुड़ गया सुबह से हुई शाम तो मुझ से बिछुड़ गया | प्रिय निर्मला जी मेरी प्रतिक्रिया कहाँ गायब हो गई पता नहीं यह पंक्तिया मेरी नजर में सबसे अच्छी हैं

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
September 8, 2015

सुप्रभात आदरणीय शोभा जी ,आज कल मेरी पोस्ट जागरण जंक्शन पर पोर्टल पर भी दिखाई नहीं देती और ज्योतिष के बाबाजी के विज्ञापन नज़र आते हैं,आपने फिर भी मेरी कविता देखली औए प्रतिक्रिया देदी आपका हार्दिक आभार ,सादर .


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