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बेटियां --- निर्मला सिंह गौर

Posted On: 8 Sep, 2015 Others में

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बेटियां मिटटी के दियों की तरह होतीं हैं
कहीं लेती हैं जन्म और कहीं जलतीं हैं |
.
कुम्हार कैसे क़रीने से दिया गढ़ता है
आग में रखता है तब उस पे रंग चढ़ता है
कोई ले जाता है मंदिर में सजाने के लिए
कोई कोई तो उसे सोने से मढ़वाता है
चार पल दूसरे के घर की रौशनी के लिए
ये दिया आग को माथे पे सजा लेता है
बेटियां मिटटी के दीयों की तरह होतीं हैं |
.
बेटियां बाग़ के फूलों की तरह होतीं हैं
कही खिलतीं है और खुशबू कहीं देती हैं
बगवां कैसे संजोता है कली का बचपन
धूप और तेज़ हवाओं से बचाता हरदम
कोई ले जाता है मंदिर में जगह देता है
कोई पैरों के तले रख के कुचल देता है
एक छोटी सी उम्र और एक अन्जान सफ़र
फूल कुछ लम्हों में ही उम्र को जी लेता है
बेटियां बाग़ के फूलों की तरह होतीं हैं |
.
बेटियां बर्फ की घाटी की तरह होतीं हैं
जब पिघलतीं हैं तो भागीरथी बन जातीं हैं
उम्र भर जंगलों और पत्थरों से टकराकर
आप ही अपने मुक़ददर से लड़ा करतीं हैं
कितनी ही बस्तियां बसतीं हैं किनारे उनके
कितने खेतों को सींचतीं हुई बह जातीं हैं
उनका अपना बुज़ूद रहता तभी तक क़ायम
जब तलक़ वो न समुन्दर में समां जातीं हैं |
बेटियां बर्फ की घाटी की तरह होतीं हैं .|
.
बेटियां काली घटाओं की तरह होतीं हैं
जब बरसतीं हैं तो धरती को हरा करतीं हैं
आसमां देर तक उनको नहीं रख पाता है
धूम से बिजलियाँ चमका के विदा करता है
धरती पलकें बिछाये करती है स्वागत उनका
और मौसम भी खुश गवार सा हो जाता है
एक दिन धरती के सीने में समां जातीं है
कहीं होतीं हैं जवां, कहीं फ़ना होतीं हैं |
.बेटियां काली घटाओं की तरह होतीं हैं |
.
बेटियां दीप हैं, कलियाँ हैं, बर्फ ,बादल हैं
आपके हाथ से टूटें ना, बहुत कोमल हैं
इनकी क़िस्मत मे कल कहाँ का सफ़र तय होगा
बेटियां आपके घर गैर की धरोहर हैं ||
………………………………………………निर्मल

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17 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
September 8, 2015

प्रिय निर्मला जी आपकी कविता मैं लगभग एक बजे के करीब पढ़ रहीं हूँ एक बार फिर मेरी आँखों मैं आंसू भने लगे मेरी बेटी मुझसे बहुत दूर पहले अमेरिका में पढ़ती थी फिर शादी के बाद सिंगापुर बस गई वह इतनी व्यस्त रहती है कभी उसेआने की जिद नहीं करती यदि आई भी हैं तो तीन रात के लिए हम दोनों की उसमें जान बस्ती है बेटियां दीप हैं, कलियाँ हैं, बर्फ ,बादल हैं आपके हाथ से टूटें ना, बहुत कोमल हैं इनकी क़िस्मत मे कल कहाँ का सफ़र तय होगा बेटियां आपके घर गैर की धरोहर हैं यह लाइनें आपने मानों मेरी राजू के लिए लिखी हैं |

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
September 8, 2015

मेरी कविता ने आपको जिसकी याद दिलाई है उस प्यारी बेटी को मेरा भी बहुत बहुत प्यार ,आदरणीय शोभा जी ,पर आज कल बेटी हो या बेटा,माता -पिता के साथ कहाँ रह पाते हैं ,उनकी याद ही आती रहती है .आपने मेरी कविता को सम्मान दिया आपका हार्दिक आभार ,सादर.

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
September 8, 2015

आदरणीय निर्मला जी, बेटियों पर एक सुंदर, भावपूर्ण कविता । बेटियां बाग़ के फूलों की तरह होतीं हैं कही खिलतीं है और खुशबू कहीं देती हैं………..बेहद सुंदर ।

sadguruji के द्वारा
September 8, 2015

बेटियां दीप हैं, कलियाँ हैं, बर्फ ,बादल हैं आपके हाथ से टूटें ना, बहुत कोमल हैं ! आदरणीया निर्मला सिंह गौर ‘निर्मल’ जी ! बहुत बेहतरीन और शिक्षाप्रद प्रस्तुति ! भावपूर्ण और लयबद्ध सुन्दर कविता ! सादर आभार !

jlsingh के द्वारा
September 9, 2015

आदरणीया निर्मल जी, बेटियों की बिदाई देखकर मैं रो पड़ता हूँ, सच में या फिल्मों में भी …आपने एक बार फिर मुझे भाव विभोर कर दिया!

pkdubey के द्वारा
September 9, 2015

हृदय द्रवित कर देने वाला काव्य आदरणीया | मेरी भी एक अग्रजा थी ,जन्म के कुछ पल बाद ही इस संसार से विदा हो गयी ,उसका जन्म चैत्र राम नवमी को हुआ था | बाबू जी जब वनारस में थे ,तो किसी सन्यासी ने,बिना कुछ उनसे पूछे , कहा था -आप से जिस कन्या ने जन्म लिया ,वह भगवती थी ,आप दुर्गा उपासना कीजिये ,सारे कष्ट दूर होंगे | तब से बाबू जी नवरात्र व्रत रखने लगे | मुझे भी लगता है ,काश उसकी एक फोटो ही होती |

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
September 9, 2015

चिन्जीव प्रवीण जी ,पढ़ कर दुःख हुआ ,काश आपकी वहन जीवित होती , जीवन में कुछ न कुछ कमी तो रहती ही है,मुझे भी बेटी की कमी खलती है तभी बेटियों के लिए मेरी चाहत और संवेदना काव्य का आकार पाती है,हार्दिक आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
September 9, 2015

आंसू निकलना सेहत के लिए अच्छा होता है ,मन हल्का हो जाता है आदरणीय जवाहर सिंह जी ,बेटी की विदाई का क्षण ,बिना आंसू बहाए हम -आप जेसे भावुक व्यक्ति कैसे देख सकते हैं ,कविता पर प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार .सादर .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
September 9, 2015

आपने कविता को पसंद किया तो कविता लिखना सार्थक हो गया आदरणीय सद्गुरुजी ,प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार ,सादर .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
September 9, 2015

कविता पढ़ कर प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक आभार आदरणीय बिष्ट जी .आपके लिखे २ शब्द मेरा उत्साह बढ़ाते हैं .सादर .

Jitendra Mathur के द्वारा
September 10, 2015

आपकी कविता पर प्रतिक्रिया के लिए मेरे पास शब्द नहीं केवल सजल नेत्र हैं निर्मला जी ।

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
September 11, 2015

आप ने कविता को अपने मन की गहराई से पढ़ा और उस की सच्ची प्रतिक्रिया देदी जितेन्द्र जी ,आभार .

Sonam Saini के द्वारा
September 14, 2015

आदरणीय मैम सादर नमस्कार …..कई दिनों पहले ये कविता पढ़ी थी ….यूँ ही चलते फिरते जे जे को देख लेने की आदत ने एक खूबसूरत कविता को पढ़ने का मौका दिलवा दिया …वरना मैं तो इतनी प्यारी कविता से वंचित ही रह जाती ….बेटियां मिटटी के दियों की तरह होतीं हैं कहीं लेती हैं जन्म और कहीं जलतीं हैं | …. इस कविता का एक एक शब्द बड़े ही सलीके से लिखा गया है ….इतनी खूबसूरत कविता लिखने के लिए आपका धन्यवाद मैम ….

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
September 14, 2015

प्रिय सोनम तुम्हारे जैसी योग्य और समझदार बेटी अगर इस कविता को पसंद कर रही है तो वाकई ये कविता अच्छी है ,इतनी सुंदर प्रतिक्रिया के लिए आभार , हार्दिक अभिनन्दन .

deepak pande के द्वारा
October 9, 2015

वाह निर्मल दीदी बेटियों के विषय में इतना सुन्दर वर्णन आपके शिव और कोई दूसरा कर भी नहीं सकता बेटियों के बिना घर में रौनक ही नहीं होती हम चार भाइयों में एक के घर बेटी है और शायद वही सब को जोड़े हुए है लगता है जैसे साड़ी रौनक ही वहां है

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
October 9, 2015

बहुत दिनों के बाद आपका अभिनन्दन है आदरणीय दीपक जी ,आपने वक्त निकाल क्र रचना को पढ़ा, समझा और मुझे प्रतिक्रिया भी दी ,आपका हार्दिक आभार ,सादर .

Bayle के द्वारा
October 17, 2016

I’m not easily imssepred but you’ve done it with that posting.


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