भोर की प्रतीक्षा में ...

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रास्ता....निर्मला सिंह गौर

Posted On: 30 Jan, 2016 Others में

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रास्ता पैर के छालों से लिपट कर रोया
सुबह का तारा उजालों से लिपट कर रोया
एक मुद्दत के बाद आया जो मै आपमे शहर
तो अपने चाहने बालों से लिपट कर रोया।
.
अश्क इतने बहे कि सारा ज़हन भीग गया
मेरे अपनों का,परायों का भी मन भीग गया
कैसे बतलाऊं मुहब्बत कि नहीं थी गिनती
एक से क्या मै हज़ारों से लिपट कर रोया ।
.
मेरे दुश्मन भी मुझे इतने भले लगने लगे
भूल कर शिकवे गिले मेरे गले लगने लगे
आग पानी से खैरियत का हाल पूछती थी
और तूफ़ान किनारों से लिपट कर रोया ।
.
घर की दहलीज़ मिली मुझसे बलैयां लेकर
मेरे बचपन की शरारत का हवाला देकर
हाय । पत्थर की इमारत भी कितनी प्यारी लगी
मैं अपने घर की दीवारों से लिपट कर रोया ।
.
उम्र तो उम्र है कट जाती है चलते चलते
रास्ते नक्शे क़दम याद कहाँ रखते हैं
पर मेरे घर का रास्ता मुझे पहचान गया
वो मेरे पैर के छालों से लिपट कर रोया।
वो मेरे पैर के छालों से लिपट कर रोया ।।
निर्मल।

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19 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bhagwandassmendiratta के द्वारा
January 31, 2016

हमेशा की तरह सुन्दर रचना है बहुत बहुत साधुवाद

pkdubey के द्वारा
February 1, 2016

मैं अपने घर की दीवारों से लिपट कर रोया -बहुत ही भाव भरा काव्य आदरणीया,दुनिया में कहीं भी रहो,पर घर की बहुत याद आती है | सादर आभार के साथ,सुस्वागतम |

jlsingh के द्वारा
February 1, 2016

उम्र तो उम्र है कट जाती है चलते चलते रास्ते नक्शे क़दम याद कहाँ रखते हैं पर मेरे घर का रास्ता मुझे पहचान गया वो मेरे पैर के छालों से लिपट कर रोया। वो मेरे पैर के छालों से लिपट कर रोया ।। वो रस्ते, वो गलियां, वो बावरी, वो तलैया, वो पनघट, वो सखियाँ …ये लोग भुलाये कहाँ भूलते हैं आदरणीया! एक मुद्दत के बाद भी ये सब हमें याद रहते हैं और वो भी हमें!

Jitendra Mathur के द्वारा
February 2, 2016

बहुत पहले पढ़ी थी आपकी यह कविता । उस समय भी दिल भर आया था । आज भी भर आया है । आपकी तो सभी कविताएं संवेदनाओं से ओतप्रोत होती हैं । इन्हें आँखों से नहीं, दिल से पढ़ा जाना होता है । अपनी बात कहूँ तो सच यही है कि ऐसी कविताओं को पढ़कर कुछ भी कहने को जी नहीं चाहता । बस दिल में एक ख़ामोशी-सी छा जाती है जो कहती है, सुना करती है ।

Ravindra K Kapoor के द्वारा
February 2, 2016

“उम्र तो उम्र है कट जाती है चलते चलते रास्ते नक्शे क़दम याद कहाँ रखते हैं पर मेरे घर का रास्ता मुझे पहचान गया वो मेरे पैर के छालों से लिपट कर रोया” अति सुन्दर मन को छु देने वाली पंक्तियाँ. साधुवाद और सुभकामनाएँ. रवीन्द्र के कपूर

Bhola nath Pal के द्वारा
February 2, 2016

उम्र तो उम्र है कट जाती है चलते चलते रास्ते नक्शे क़दम याद कहाँ रखते हैं पर मेरे घर का रास्ता मुझे पहचान गया भाव व् शव्द चयन अच्छा ………….

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 2, 2016

Aapka hardik aabhar praveen ji.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 2, 2016

Aapka abhinandan hai aadrniy singh sahab.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 2, 2016

Hardik aabhar Jitendra ji.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 2, 2016

Dhanywad kapoor sahab aapka blog par abhinandan hai.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 2, 2016

Sadar aabhar aadrniy bholanath ji.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 2, 2016

Sadar aabhar aapka bhagwandassji.

Shobha के द्वारा
February 2, 2016

प्रिय निर्मला जी बहुत समय बाद आपको देखा और अतिउत्तम भाव पूर्ण कविता पढने को मिली मेरा चश्मा टूट गया था अत : अपने विचार रखने में देर हुई मेरे दुश्मन भी मुझे इतने भले लगने लगे भूल कर शिकवे गिले मेरे गले लगने लगे आग पानी से खैरियत का हाल पूछती थी और तूफ़ान किनारों से लिपट कर रोया । अति सुंदर

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 3, 2016

कुछ व्यक्तिगत कारणों से मंच पर रेगुलर नहीं हो पा रही हूँ ,लेकिन आप को और उन सभी सुधी रचना कारों को अक्सर याद करती हूँ जिन्होंने मेरी रचनाओं को अपने स्नेह से सींचा है ,आप सबका हार्दिक आभार आदरणीय शोभा जी सादर

yamunapathak के द्वारा
February 4, 2016

निर्मला जी बहुत ही उम्दा कविता है. साभार

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 6, 2016

आपका हार्दिक आभार यमुना जी ।

sadguruji के द्वारा
February 9, 2016

घर की दहलीज़ मिली मुझसे बलैयां लेकर मेरे बचपन की शरारत का हवाला देकर हाय । पत्थर की इमारत भी कितनी प्यारी लगी मैं अपने घर की दीवारों से लिपट कर रोया । आदरणीया निर्मला सिंह गौर जी ! बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना ! बहुत बहुत अभिनन्दन और नववर्ष की बधाई !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 11, 2016

हार्दिक आभार आदरणीय सद्गुरु जी,सादर।

Cindy के द्वारा
October 17, 2016

I don’t know who you wrote this for but you helped a breohtr out.


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