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मेरे पहलू का अँधियारा ---निर्मला सिंह गौर

Posted On: 28 Oct, 2016 में

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मै दीपक प्रज्वलित ,आल्हादित ,
अपना अंतर्मन सुलगा कर,
करता हूँ आकाश प्रकाशित ,
तुमने स्वर्ण पत्र मढ़ डाला ,
मिटटी के बेढब से तन को ,
किन्तु झांक कर देखा है क्या ,
मेरे तल के स्थिर तम को |
.
जब जलता हूँ घर के द्वारे ,
हो जाते हैं पथ उजयारे,
अंधकार के काले साये ,
भगते हैं सब डर के मारे|
.
फिर भी हूँ बिक्षुब्ध ज़रा सा ,
दूर तलक तो है उजियारा ,
किन्तु कभी ना मिट पायेगा ,
मेरे पहलू का अँधियारा |
.
इतना अनुभव तो है मेरा ,
अगर बुराई का हो डेरा ,
उसे मिटाना है तुमको तो ,
कुछ तो आखिर करना होगा ,
थोडा सा तो जलना होगा |
.
मेरे सारे भाई सज गये
हर घर में मन रही दिवाली ,
लक्ष्मीजी के आवाहन को
सबने सिर पर आग सजा ली ,
हार गया है दीपोत्सव से ,
अमावस्य का काला साया ,
किन्तु कभी ना मिट पायेगा ,
मेरे पहलू का अँधियारा |
.
तुमने ईश्वर के सम्मुख रख ,
रोज़ किया सम्मानित मुझको ,
मिटटी का कण बना सितारा ,
किन्तु मिटा ना पाए भगवन,
मेरे पहलू का अँधियारा ||
.
सभी साथियों को दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाएं —निर्मल



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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
November 5, 2016

बहुत ही अच्छी और प्रभावशाली कविता है यह आपकी निर्मला जी । उत्कृष्ट से निम्न तो आपकी किसी भी कविता की गुणवत्ता का स्तर हो ही नहीं सकता । लेकिन जिस तरह रोशनी फैलाने वाली शमा की किस्मत जलना ही है, उसी तरह परहिताभिलाषी भी न केवल कष्ट सहने को वरन अंधकार के सान्निध्य में रहने को भी अभिशप्त होते हैं । अपनी नियति से कौन बच सकता है, कौन बच सका है ? ’बुझा है दिल भरी महफ़िल को रोशनी देकर, मरूंगा भी तो हज़ारो को ज़िंदगी देकर’ - ख़ुद जलकर औरों को रोशन करने वाले की ज़िंदगी का फ़लसफ़ा तो यही हो सकता है ।

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 5, 2016

आपका हार्दिक आभार जितेन्द्र जी , आपकी ये दो पंक्तियाँ भी बहुत उत्कृष्ट हैं ,सादर अभिनन्दन .//

sadguruji के द्वारा
November 5, 2016

आदरणीया निर्मला सिंह गौर जी ! बहुत सुन्दर, भावपूर्ण और उत्कृष्ट कविता ! कई महीने बाद आपने मंच पर कोई कृति प्रस्तुत की है ! देर से ही सही, दिवाली की शुभकामनाएं स्वीकार कीजिये ! अच्छी प्रस्तुति हेतु सादर आभार !

Shobha के द्वारा
November 5, 2016

प्रिय निर्मला जी आपकी कविता कई बार पढ़ी अपनी पसन्द लिखी परन्तु प्रतिक्रिया जा नहीं रही थी जब तक लेखक की रचना पढ़ने वाले न हो उसका रसास्वादन करने वाले न हों अपनी प्रतिक्रिया देने वाले न हों लेखक को अच्छा नहीं लगता अबकी बार पढ़ने वाले भी थे कविता का आनन्द लेने वाले भी थे अपने विचार रखने के आतुर भी थे परन्तु आप तक विचार पहुंचाने का माध्यम उदासीन था

jlsingh के द्वारा
November 6, 2016

तुमने ईश्वर के सम्मुख रख , रोज़ किया सम्मानित मुझको , मिटटी का कण बना सितारा , किन्तु मिटा ना पाए भगवन, मेरे पहलू का अँधियारा || आदरणीया निर्मल जी, सादर अभिनन्दन ! चाहे दीपक के पहलू में अँधेरा हो पर वह ज्योति प्रदान तो करता ही रहता है. आप भी अपनी कविता की ज्योति को प्रज्वलित रक्खें और समयनुसार इस मंच को प्रकाश देती रहें सादर!

Alka के द्वारा
November 6, 2016

आदरणीय निर्मला जी बेहद भावपूर्ण अभिव्यक्ति . सच है एक दिया जो अंधकार को मिटा देता है पर उसके अंदर छुपा अँधेरा शायद ही किसी को नजर आता हो | अति सुन्दर रचना …

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 9, 2016

हार्दिक आभार आदरणीय सद्गुरुजी ,कुछ व्यस्तताओं की बजह से मेरे अपने शौक नज़रंदाज़ हो रहे हैं ,बस कुछ दिन की बात हैं ,कविता पर प्रतिक्रिया का हार्दिक अभिनन्दन है ,सादर .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 9, 2016

प्रणाम आदरणीय शोभाजी ,आपने सच कहा है प्रोत्साहन ही लेखक की लेखनी को गतिशीलता प्रदान करता है और मेरी लेखनी बहुत खुशनसीब है कि आप जैसे श्रेष्ठ लेखक मुझे अपना स्नेह देते हैं ,आपका सादर आभार .

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 9, 2016

आपकी प्रेरणा के लिए अतिशय आभार आदरणीय जवाहर सिंह जी आपने उचित प्रतिक्रिया दी, दीपक ज्योति तो प्रदान करता ही है ,परन्तु रौशनी आखिर कहीं पर तो बिवश है ,बीच में प्रतिक्रियाएं जा ही नही रही थीं ,मुझे आपकी” एक दिया सैनिक के नाम “कविता बहुत अच्छी लगी ,एसे ही सम्वेदनाओं में रची बसी रचनाएँ लिखते रहिये ,सादर.

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
November 9, 2016

हार्दिक आभार अलका जी ,आपने कविता का मर्म समझ कर बहुत सुंदर प्रतिक्रिया दी ,आपका सदैव ब्लॉग पर अभिनन्दन है .


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